सुबह के करीब आठ बजे थे। दीपिका नाश्ते की मेज पर बैठी थी और शशांक उसके लिए पराठे बना रहा था। दीपिका ने जैसे ही चाय का कप उठाया, शशांक ने तुरंत उसके हाथ से कप ले लिया।
“रुको, बहुत गर्म है। पहले थोड़ा ठंडा हो जाने दो।”
“शशांक, मैं बच्ची नहीं हूँ। खुद पी सकती हूँ।”
“मेरे लिए तो तुम बच्ची ही हो।”
दीपिका मुस्कराकर नाश्ता करने लगी। तभी उसने बताया कि आज उसका सिर थोड़ा भारी लग रहा है। बस इतना सुनना था कि शशांक ने तुरंत उसके माथे पर हाथ रखा, थर्मामीटर निकाल लिया और डॉक्टर को फोन लगाने लगा।
“अरे! मैंने सिर्फ सिर भारी होने की बात कही है, बीमार नहीं पड़ी हूँ!”
“तुम्हें अपनी सेहत की परवाह नहीं है, तो मुझे करनी पड़ेगी। आज ऑफिस से छुट्टी ले लेता हूँ।”
“बिल्कुल नहीं! तुम्हारी मीटिंग है।”
“मीटिंग रोज होती है, तुम नहीं।”
दीपिका ने हँसते हुए उसे गले लगा लिया। शशांक ने उसके लिए नाश्ता पूरा किया, दवाई और पानी मेज पर रखा और जाते समय घर के बाहर तक उसे कई बार समझाया कि आराम करना है और कोई काम नहीं करना है।
संयोग से यह पूरा दृश्य अपने घर की बालकनी में खड़े भरत ने देख लिया था। उसने अपनी पत्नी सुशीला को आवाज लगाई।
“अरे सुशीला! जरा देखो तो। इस शशांक को! बीवी को जरा-सा सिरदर्द क्या हुआ, जनाब ने पूरा अस्पताल घर में खोल दिया।”
सुशीला हँस पड़ी।
“बिल्कुल पत्नी पगलू है।”
दरअसल, शशांक और भरत के बीच कभी अच्छे संबंध नहीं रहे थे। दोनों के घर अगल-बगल थे, लेकिन उनके दिलों के बीच काफी दूरी थी। छोटी-छोटी बातों पर बहस होना आम था। उनकी पत्नियों का भी कुछ ऐसा ही हाल था। भरत की उम्रदराज पत्नी सुशीला और शशांक की नई-नई ब्याही पत्नी दीपिका के बीच भी अक्सर अनबन होती रहती थी।
शशांक की शादी दीपिका से परिवार वालों की मर्जी से तय हुई थी। शुरुआत में वह इस शादी को लेकर बहुत उत्साहित नहीं था, लेकिन दीपिका के जीवन में आते ही उसकी दुनिया बदल गई। वह अपनी पत्नी के प्यार में पूरी तरह डूब चुका था।
उसका प्यार किसी से छिपा नहीं था। दीपिका का पर्स उठाना, उसके लिए कार का दरवाजा खोलना, सड़क पार करते समय उसका हाथ पकड़ना, खुद भीगकर उसे बारिश से बचाना और हर थोड़ी देर में उसका हाल पूछना उसकी आदत थी।
भरत और सुशीला को शशांक की इन हरकतों को बढ़ा-चढ़ाकर दूसरे पड़ोसियों को सुनाने में बड़ा मजा आता था।
एक बार भरत ने कुछ पड़ोसियों से कहा,
“हमने अपनी जिंदगी में बहुत पति देखे हैं, लेकिन शशांक जैसा नहीं। दीपिका अगर चाँद माँग ले, तो पहले सीढ़ी खरीदने निकल पड़ेगा!”
जब शशांक को अपने इस नए नाम के बारे में पता चला, तो वह भी हँस पड़ा।
“पत्नी पगलू ही सही, अंकल। कम से कम किसी के लिए तो पागल हूँ।”
भरत ने आँखें घुमाईं और दोनों परिवारों के बीच पुरानी खींचतान चलती रही।
लेकिन किसी को अंदाजा नहीं था कि जल्द ही परिस्थितियाँ उनके रिश्तों को पूरी तरह बदल देंगी।
एक दिन भरत को किसी पारिवारिक समारोह में शामिल होने के लिए दूसरे शहर जाना पड़ा। वह सुशीला को घर पर अकेला छोड़कर चला गया। सुशीला पिछले दो दिनों से थोड़ा अस्वस्थ महसूस कर रही थी, लेकिन उसने इसे सामान्य कमजोरी समझकर नजरअंदाज कर दिया।
अगले दिन अचानक उसकी तबीयत बिगड़ गई। उसे तेज बुखार, अत्यधिक कमजोरी और साँस लेने में तकलीफ होने लगी। पानी पीने के लिए रसोई की तरफ जाते समय उसे चक्कर आया और वह जमीन पर गिर पड़ी।
कुछ देर बाद दीपिका बाजार से लौट रही थी। उसने देखा कि भरत के घर का मुख्य दरवाजा थोड़ा खुला हुआ है। उसने आवाज लगाई, लेकिन कोई जवाब नहीं मिला। अंदर जाकर देखा तो सुशीला जमीन पर बेहोश पड़ी थी।
“अरे आंटी!”
दीपिका तुरंत उनके पास पहुँची। उसने उन्हें सहारा देकर बिस्तर पर लिटाया और डॉक्टर को बुलाया। डॉक्टर ने अस्पताल में भर्ती कराने की सलाह दी तो दीपिका ने बिना देर किए गाड़ी का इंतजाम किया, जरूरी कागजात इकट्ठे किए और सुशीला को लेकर अस्पताल पहुँच गई।
उसने भरत को भी फोन किया। काफी देर बाद जब भरत का फोन लगा, तो वह घबरा गया।
“दीपिका बेटा! सुशीला कैसी है? मैं अभी निकलता हूँ!”
“अंकल, आप घबराइए मत। आंटी का इलाज शुरू हो गया है। आप जल्दी आ जाइए।”
“बेटा, तुम वहाँ हो?”
“जी अंकल।”
भरत की आवाज भर्रा गई।
“तुम्हारा बहुत एहसान रहेगा, बेटा।”
दीपिका ने तुरंत कहा, “अंकल, प्लीज एहसान मत कहिए। आंटी मेरी भी तो हैं।”
भरत कुछ नहीं बोल पाया। दीपिका के ये शब्द उसके दिल में उतर गए।
डॉक्टरों ने बताया कि सुशीला को गंभीर संक्रमण हो गया है और उनकी पहले से मौजूद स्वास्थ्य समस्याओं के कारण स्थिति थोड़ी जटिल हो गई है। उन्हें तत्काल इलाज और निगरानी की जरूरत थी।
शशांक भी ऑफिस से जल्दी निकलकर अस्पताल पहुँच गया। उसने देखा कि दीपिका सुशीला के बिस्तर के पास बैठी उनका हाथ पकड़े हुए है।
“दीपिका, तुमने सुबह से कुछ नहीं खाया। चलो, पहले कुछ खा लो।”
“शशांक, आंटी की तबीयत थोड़ी स्थिर हो जाए, फिर खा लूँगी।”
“मैं यहाँ हूँ। तुम थोड़ी देर घर जाकर आराम कर लो।”
दीपिका ने उसकी तरफ देखा।
“प्लीज मेरी बात समझने की कोशिश करो। आंटी को अभी किसी अपने की जरूरत है। अंकल भी रास्ते में हैं। जब तक वे नहीं आ जाते, मैं इन्हें अकेला नहीं छोड़ सकती।”
शशांक अपनी पत्नी को अच्छी तरह जानता था। वह समझ गया कि जब तक दीपिका को यह नहीं लगेगा कि सुशीला ठीक हैं, वह वहाँ से नहीं हटेगी।
उसने उसके खाने का इंतजाम किया, तकिया और कंबल लाकर दिया और उसकी सुविधा का पूरा ध्यान रखा। जाने से पहले उसने प्यार से दीपिका के माथे को चूमा।
“अपना भी ख्याल रखना। मुझे भी तुम्हारी जरूरत है।”
दीपिका मुस्कराई। “जल्दी आना।”
“रोज आऊँगा।”
और शशांक ने अपना वादा निभाया। अगले कई दिनों तक वह सुबह-शाम अस्पताल आता रहा। दीपिका के लिए खाना लाता और घर की सारी जिम्मेदारियाँ संभालता। लेकिन दीपिका सुशीला के पास ही रही। वह उन्हें खाना खिलाती, समय पर दवाइयाँ देती, तकिया ठीक करती और रात में भी जागकर उनका ध्यान रखती।
कई बार सुशीला की आँख खुलती तो वह दीपिका को अस्पताल की कुर्सी पर असुविधाजनक स्थिति में सोते हुए पातीं।
एक रात उन्होंने धीरे से आवाज लगाई।
“दीपिका…”
दीपिका तुरंत जाग गई।
“जी आंटी? कुछ चाहिए?”
सुशीला ने उसका हाथ पकड़ लिया।
“बेटा, तुम घर क्यों नहीं चली जाती? कितने दिन हो गए। तुम्हारी भी अपनी जिंदगी है।”
दीपिका मुस्कराई।
“आंटी, अभी तो यही मेरा घर है। आप ठीक हो जाइए, फिर अपने घर भी चलेंगे।”
सुशीला की आँखों में आँसू आ गए। उन्होंने दीपिका का हाथ प्यार से दबाया।
“पगली कहीं की… बेटी हो तुम मेरी।”
दीपिका कुछ बोल नहीं पाई। उसने झुककर अपना माथा सुशीला के हाथ पर रख दिया।
कुछ दिनों बाद भरत अस्पताल पहुँचा। वह घबराया हुआ सुशीला के कमरे की तरफ भागा, लेकिन दरवाजे पर ही रुक गया। उसकी पत्नी बिस्तर पर बैठी थी और दीपिका उसे खिचड़ी खिला रही थी।
“बस आंटी, एक और निवाला।”
“अरे बेटा, पेट भर गया।”
“नहीं, डॉक्टर ने कहा है कि अच्छे से खाना है।”
भरत उन्हें देखता रहा। उसकी आँखें नम हो गईं।
“दीपिका बेटा…”
दीपिका तुरंत उठ खड़ी हुई।
“अंकल! आप आ गए!”
उसने भरत के पैर छुए। भरत ने उसके सिर पर हाथ रखकर आशीर्वाद दिया।
“खुश रहो, बेटा।”
सुशीला मुस्कराईं और बोलीं, “तुम्हारी बेटी ने संभाल लिया।”
भरत ने उनकी तरफ देखा।
“हमारी बेटी?”
“हाँ, हमारी बेटी।”
भरत अपनी भावनाओं पर काबू नहीं रख पाया। उसने दीपिका की तरफ देखकर कहा,
“बेटा, तुमने वह कर दिया जो शायद अपने भी कभी-कभी नहीं कर पाते। मेरी गैरमौजूदगी में तुमने मेरी सुशीला को अकेला महसूस नहीं होने दिया।”
दीपिका ने प्यार से जवाब दिया, “अंकल, आप ऐसा क्यों कह रहे हैं? आप होते तो आप भी तो यही करते।”
भरत ने सिर हिलाया।
“हम दोनों की कोई संतान नहीं है, बेटा। कभी-कभी लगता था कि बुढ़ापे में अपना कहने वाला कोई नहीं होगा। लेकिन आज लगता है कि भगवान ने हमें बेटी दे दी।”
दीपिका ने उन्हें गले लगा लिया। भरत ने भी उसे अपनी बेटी की तरह सीने से लगा लिया।
कुछ दिनों बाद सुशीला को अस्पताल से छुट्टी मिल गई। दीपिका उन्हें घर लेकर आई और उनके आराम की पूरी व्यवस्था की। उसने दवाइयों और उनके समय का एक चार्ट बनाकर फ्रिज पर भी चिपका दिया।
शशांक ने मजाक में कहा, “दीपिका, लगता है अब तुम्हारा एक और घर हो गया।”
वह मुस्कराई, “एक घर से दूसरे घर की दूरी ही कितनी है?”
भरत ने यह बात सुन ली और तुरंत बोला, “दीवार का फासला तो पहले भी था, शशांक। लेकिन दिलों का फासला बहुत ज्यादा था।”
इसके बाद सब कुछ बदल गया। भरत और सुशीला दीपिका को अपनी बेटी की तरह प्यार करने लगे। कभी उसके लिए फल लेकर आते, कभी अपने घर का खाना भेजते और कभी उसकी तबीयत पूछने पहुँच जाते।
सुशीला अक्सर अपनी बनाई हुई सब्जी दीपिका के लिए भेजतीं।
“दीपिका बेटा, आज तुम्हारी पसंद की सब्जी बनाई है।”
“अरे आंटी, आपको आराम करना चाहिए!”
“चुप! माँ को बेटी के लिए खाना बनाने से भी रोकोगी?”
भरत की भी एक नई आदत बन गई थी। जब भी शशांक दीपिका के प्रति कुछ ज्यादा ही प्यार जताता, वह जोर से आवाज लगाता,
“लो भाई, हमारे पत्नी पगलू साहब आ गए!”
लेकिन अब वह तुरंत जोड़ देता,
“और हम तो बेटी पगलू हैं!”
सुशीला भी तुरंत हामी भर देतीं।
“बिल्कुल! हमारी बेटी है ही इतनी प्यारी।”
धीरे-धीरे दीपिका की अच्छाई पूरे मोहल्ले में मशहूर हो गई। वह बुजुर्ग पड़ोसियों की दवाइयों का इंतजाम करने में मदद करती, बच्चों की पढ़ाई में हाथ बँटाती और जरूरत पड़ने पर किसी के भी काम आ जाती। वह कभी अपने इन कामों का दिखावा नहीं करती थी। उसके लिए पड़ोस में रहने वालों की मदद करना बस एक स्वाभाविक जिम्मेदारी थी।
एक शाम मोहल्ले के एक कार्यक्रम में भरत से कुछ बोलने का आग्रह किया गया। वह खड़े हुए और दीपिका की तरफ देखकर बोले,
“हम अक्सर कहते थे कि आजकल पड़ोसियों में पहले जैसी बात नहीं रही। सब अपनी-अपनी जिंदगी में व्यस्त हैं। लेकिन जब मेरी पत्नी जिंदगी और मौत के बीच जूझ रही थी, तब उसका हाथ थामने वाला कोई रिश्तेदार नहीं, बल्कि मेरी पड़ोसन थी। उसने अपना आराम और अपनी नींद भुलाकर मेरी पत्नी को संभाला। हम दोनों की कोई संतान नहीं है, लेकिन आज हमें लगता है कि भगवान ने हमें बेटी दे दी है।”
फिर मुस्कराते हुए उन्होंने घोषणा की,
“शशांक को तो हमने पत्नी पगलू कहा था, लेकिन अब हम दोनों भी बेटी पगलू हैं!”
पूरा मोहल्ला तालियों से गूँज उठा। दीपिका की आँखें नम हो गईं। शशांक ने प्यार से उसका हाथ पकड़कर कहा,
“मुझे तुमसे पहले ही प्यार हो गया था, लेकिन आज तुम पर और भी ज्यादा गर्व हो रहा है।”
दीपिका मुस्कराई। “बस, अब ज्यादा फिल्मी मत बनो।”
भरत ने तुरंत आवाज लगाई, “अरे! पत्नी पगलू फिर शुरू हो गया!”
सभी लोग हँस पड़े।
उस दिन भरत और सुशीला ने महसूस किया कि रिश्ते केवल खून से नहीं बनते। कभी-कभी एक पड़ोसी भी वह अपनापन दे जाता है, जिसकी कमी जीवन भर महसूस होती है।
शशांक पत्नी पगलू था क्योंकि उसे ऐसी पत्नी मिली थी, जिससे अंतहीन प्यार किया जा सकता था। और भरत व सुशीला बेटी पगलू बन गए थे क्योंकि उन्हें ऐसी बेटी मिली थी, जिसे जीवन भर संजोकर रखा जा सकता था।
क्योंकि अच्छा पड़ोसी वह नहीं होता जो सिर्फ आपके बगल में रहता है, बल्कि वह होता है जो आपके मुश्किल वक्त में आपके साथ खड़ा रहता है। कभी-कभी एक दीवार साझा करने वाले लोग दिलों का ऐसा रिश्ता बना लेते हैं, जो जिंदगी भर के लिए परिवार बन जाता है।

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