हम रोज़ जो खाना खाते हैं, उसमें कई सदियों पुरानी कहानियाँ छिपी हैं। कुछ चीज़ें सिल्क रूट यानी रेशम मार्ग से हमारे देश पहुँचीं, कुछ व्यापारियों और समुद्री यात्रियों के साथ आईं, तो कुछ खोजकर्ताओं और विदेशी बस्तियों के ज़रिये हम तक पहुँचीं। इनका सफर सदियों पहले शुरू हुआ था, लेकिन इनकी यादें आज भी हमारे रोज़मर्रा के खाने-पीने के नामों में ज़िंदा हैं।
हम रोज़ खाना खाते हैं, लेकिन शायद ही कभी सोचते हैं कि ये चीज़ें आई कहाँ से, हमारे रसोईघर तक कैसे पहुँचीं और इनके नाम ऐसे क्यों पड़े।
लेकिन अगर हम अपनी रसोई पर थोड़ा गौर करें, तो एक दिलचस्प बात सामने आती है। हमारे फलों, सब्ज़ियों, मसालों और पेय पदार्थों के नामों में पुराने व्यापारिक रास्तों, दूर-दराज़ के शहरों, दूसरे देशों और सदियों पुराने सांस्कृतिक मेलजोल की कहानियाँ छिपी हुई हैं।
कह सकते हैं कि हमारी रोज़मर्रा की भाषा में ही दुनिया का एक पुराना नक्शा छिपा है।
जब चीन हमारे चीनी के डिब्बे तक पहुँचा
चीनी आज हमारी रोज़मर्रा की ज़िंदगी का एक बेहद ज़रूरी हिस्सा है। दूध, चाय, कॉफी, मिठाई, हलवा, खीर और न जाने कितनी चीज़ों में हम इसका इस्तेमाल करते हैं।
लेकिन हिंदी में हम इसे शुगर नहीं कहते। हम इसे कहते हैं चीनी।
इस नाम से ही चीन की याद आती है। पुराने समय में भारतीय व्यापारी सिल्क रूट यानी रेशम मार्ग के रास्ते चीन से बड़ी मात्रा में चीनी लाया करते थे। चीनी नाम आज भी उन पुराने व्यापारिक संबंधों की याद दिलाता है।
एक और दिलचस्प नाम है मिश्री। चीनी के छोटे-छोटे पारदर्शी दाने, जिन्हें हम पूजा-पाठ, प्रसाद और कई पारंपरिक इस्तेमालों में देखते हैं। मिश्री का नाम मिस्र से जुड़ा माना जाता है। मिस्र को अरबी भाषा में मिस्र कहा जाता है।
यानी हमारी रसोई में रखी मिठास भी हमें चीन और मिस्र जैसी दूर की सभ्यताओं की याद दिलाती है।
आलूबुखारा: एक फल के नाम में बसा शहर
अब बात करते हैं एक साधारण से दिखने वाले फल की, प्लम की।
हिंदी में इसे आलूबुखारा कहते हैं। इस नाम में बुखारा शहर का नाम छिपा है, जो आज के उज़्बेकिस्तान में स्थित है।
बुखारा कभी सिल्क रूट का एक बड़ा व्यापारिक और सांस्कृतिक केंद्र हुआ करता था। यहाँ से व्यापारी और यात्रियों के काफिले मध्य एशिया, फारस, भारत और चीन के बीच आते-जाते थे।
आलूबुखारा नाम हमें उसी पुराने व्यापारिक रास्ते की याद दिलाता है। ऐसा लगता है जैसे इस फल ने अपने नाम में उस शहर की याद हमेशा के लिए सँभालकर रख ली हो।
कसूरी मेथी: सरहद पार से आई खुशबू
भारतीय रसोई में इस्तेमाल होने वाली एक और जानी-पहचानी चीज़ है कसूरी मेथी।
इसका नाम आज के पाकिस्तान के कसूर शहर से जुड़ा है।
सूखी हुई मेथी की पत्तियाँ उत्तर भारतीय खाने में खूब इस्तेमाल होती हैं। बटर चिकन, पनीर या दाल में थोड़ी-सी कसूरी मेथी डाल दीजिए, पूरे खाने की खुशबू बदल जाती है।
कसूरी नाम हमें उस दौर की याद दिलाता है, जब आज की अंतरराष्ट्रीय सीमा के दोनों तरफ के इलाके व्यापार, खेती, खान-पान और रोज़मर्रा के जीवन से एक-दूसरे से जुड़े हुए थे।
काबुली चना: काबुल से भारतीय रसोई तक
चना हमारे खान-पान का एक बेहद अहम हिस्सा है। यह प्रोटीन का अच्छा स्रोत है और स्कूलों के मिड-डे मील से लेकर हॉस्टल की मेस, ढाबों और घरों तक हर जगह दिखाई देता है।
छोले, चना मसाला और चना चाट किसे पसंद नहीं होंगे!
लेकिन चने की एक किस्म का नाम है काबुली चना।
इसका नाम अफगानिस्तान की राजधानी काबुल से जुड़ा है। बड़े आकार और हल्के रंग वाला यह चना पुराने समय में अफगानिस्तान और मध्य एशिया से जुड़े उत्तर-पश्चिमी व्यापारिक रास्तों के माध्यम से भारतीय उपमहाद्वीप तक पहुँचा।
आज काबुली चना भारतीय रसोई का अपना हिस्सा बन चुका है। कभी दूर देश से आया यह अनाज अब हमारे रोज़मर्रा के खाने में पूरी तरह घुल-मिल गया है।
बटाटा: मराठी भाषा में पुर्तगाल की याद
महाराष्ट्र में आलू को आमतौर पर बटाटा कहा जाता है।
इस शब्द की कहानी बड़ी दिलचस्प है। इसका संबंध कैरेबियन क्षेत्र में शकरकंद के लिए इस्तेमाल होने वाले शब्द Batata से है, जिसे स्पेनिश और पुर्तगाली खोजकर्ता यूरोपीय भाषाओं में लेकर आए।
आलू का मूल स्थान दक्षिण अमेरिका का एंडीज़ पर्वतीय क्षेत्र है। यूरोपीय समुद्री व्यापार और औपनिवेशिक दौर के दौरान आलू भारत पहुँचा।
पुर्तगालियों ने गोवा में अपनी बस्तियाँ बसाईं। उनके रहन-सहन, खान-पान और भाषा का असर आसपास के इलाकों की भाषाओं पर भी पड़ा।
बटाटा शब्द इसी सांस्कृतिक मेलजोल की एक छोटी-सी निशानी है। आज बटाटा वड़ा, बटाटा पोहा और बटाटा भाजी महाराष्ट्र के खान-पान की पहचान बन चुके हैं।
मोसंबी: मोज़ाम्बिक की मीठी याद
मीठे नींबू जैसे दिखने वाले फल को हम भारत में मोसंबी के नाम से जानते हैं।
इस नाम को अफ्रीका के दक्षिण-पूर्वी तट पर बसे देश मोज़ाम्बिक से जोड़ा जाता है।
गर्मियों में मोसंबी खाना हो या उसका ताज़ा जूस पीना, यह फल हमारी रोज़मर्रा की ज़िंदगी का हिस्सा है। लेकिन इसका नाम हमें हिंद महासागर पार अफ्रीका के पूर्वी तट तक ले जाता है।
हमारे फलवाले रोज़ आवाज़ लगाकर मोसंबी का जूस बेचते हैं, शायद उन्हें भी अंदाज़ा नहीं होता कि इस नाम में एक दूसरे महाद्वीप की याद छिपी हुई है।
कॉफी और इथियोपिया का काफ़ा इलाका
कॉफी की कहानी भी बड़ी दिलचस्प है।
कॉफी के पौधों की उत्पत्ति इथियोपिया में हुई और वहाँ के दक्षिण-पश्चिमी हिस्से में स्थित काफ़ा क्षेत्र को अक्सर कॉफी के इतिहास से जोड़ा जाता है।
इथियोपिया से कॉफी यमन पहुँची और फिर अरब देशों के रास्ते यूरोप तथा दुनिया के दूसरे हिस्सों तक फैल गई।
भारत में भी कॉफी की अपनी एक समृद्ध परंपरा विकसित हुई, खासकर दक्षिण भारत में। आज दक्षिण भारत की फिल्टर कॉफी उतनी ही मशहूर है, जितनी उत्तर भारत की एक प्याली गरमा-गरम चाय।
चाय: चीन से आया एक शब्द, भारतीय प्याली में
गरमा-गरम चाय की प्याली के बिना तो भारत में बहुत से लोगों की सुबह ही नहीं होती।
लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि चाय शब्द आया कहाँ से?
यह चीन के शब्द चा (茶) से आया है। मंदारिन सहित चीन की कई भाषाओं में चाय को चा कहा जाता है।
दुनिया में चाय के लिए इस्तेमाल होने वाले शब्दों के दो बड़े रूप देखने को मिलते हैं। चाय और चा जैसे शब्द मुख्य रूप से ज़मीनी व्यापारिक रास्तों, खासकर सिल्क रूट के ज़रिये दुनिया के दूसरे हिस्सों तक पहुँचे।
वहीं टी, थé और थी जैसे शब्द समुद्री व्यापार के रास्ते फैले। इनका संबंध चीन के उन तटीय इलाकों से है जहाँ चाय के लिए इस्तेमाल होने वाला उच्चारण कुछ अलग था।
यानी हमारी रोज़ की चाय की प्याली में भी सदियों पुराने अंतरराष्ट्रीय व्यापार की कहानी छिपी हुई है।
अनानास: दक्षिण अमेरिका से आया फल
भारत की कई भाषाओं में पाइनएप्पल को अनानास कहा जाता है।
यह शब्द दक्षिण अमेरिका के मूल निवासियों की तुपी भाषा के शब्द नानास से आया है।
पुर्तगाली व्यापारी इस शब्द को अपने साथ दुनिया के दूसरे हिस्सों में ले गए। धीरे-धीरे यह फल भारतीय बाज़ारों और रसोईघरों तक भी पहुँच गया।
आज अनानास फलों की चाट, मिठाइयों, जूस और कई तरह के पकवानों में इस्तेमाल होता है।
सोचिए, हमारी फलों की टोकरी में रखा एक साधारण-सा अनानास हमें दक्षिण अमेरिका के उष्णकटिबंधीय जंगलों तक पहुँचा सकता है!
इमली: भारत का खजूर
अंग्रेज़ी का शब्द Tamarind अरबी भाषा के शब्द तमर हिंदी से आया है, जिसका मतलब है भारत का खजूर।
इमली के फल की बनावट और उसके गूदे की वजह से इसकी तुलना खजूर से की गई थी।
यह कितनी दिलचस्प बात है कि सांभर, चटनी, पानीपुरी और तरह-तरह की सब्ज़ियों में इस्तेमाल होने वाली इमली के अंग्रेज़ी नाम में भारत का ज़िक्र छिपा हुआ है।
यह भी इस बात की याद दिलाता है कि भारत की चीज़ें भी पुराने समय में दूसरे देशों तक पहुँचीं और अपने साथ अपनी पहचान लेकर गईं।
टमाटर: अमेरिका से आया एक नाम
टमाटर शब्द की जड़ें मैक्सिको के मूल निवासियों की नाहुआत्ल भाषा के शब्द टोमाट्ल में मिलती हैं।
स्पेनिश भाषा के रास्ते यह शब्द यूरोप पहुँचा और फिर दुनिया के दूसरे हिस्सों में फैल गया।
आज भारतीय खाना टमाटर के बिना अधूरा लगता है। हमारी दाल, सब्ज़ी, चटनी और तरह-तरह की ग्रेवी में इसका इस्तेमाल होता है।
लेकिन इसके नाम में छिपी कहानी हमें हजारों किलोमीटर दूर अमेरिका महाद्वीप तक ले जाती है।
खाना सिर्फ पेट भरने का ज़रिया नहीं, इतिहास की किताब भी है
हवाई जहाज़, रेफ्रिजरेटर वाले कंटेनर और अंतरराष्ट्रीय सुपरमार्केट आने से बहुत पहले ही दुनिया के अलग-अलग हिस्सों के बीच खाने-पीने की चीज़ों का व्यापार होता था।
सिल्क रूट पर ऊँटों के काफिले चलते थे। अरब सागर और हिंद महासागर में जहाज़ चलते थे। व्यापारी मसाले, फल, अनाज और बीज एक जगह से दूसरी जगह ले जाते थे। खोजकर्ता नई फसलें नए देशों तक पहुँचाते थे और एक जगह से दूसरी जगह जाने वाले लोग अपने साथ अपने खाने का स्वाद और बनाने के तरीके भी ले जाते थे।
इनमें से हर सफर अपने पीछे कुछ न कुछ छोड़ गया।
कभी कोई नया फल या सब्ज़ी, कभी कोई नई रेसिपी और कभी सिर्फ एक नया शब्द।
इसलिए भारतीय रसोई सिर्फ खाना बनाने की जगह नहीं है। यह इंसानों के आने-जाने, व्यापार और अलग-अलग संस्कृतियों के मिलने-जुलने का एक जीता-जागता संग्रहालय है।
अगली बार जब आप सब्ज़ी में कसूरी मेथी डालें, आलूबुखारा खाएँ, काबुली चने बनाएँ, बटाटा वड़ा का स्वाद लें, मोसंबी का जूस पिएँ या चाय में चीनी और मिश्री मिलाएँ, तो एक पल के लिए ज़रूर सोचिएगा।
इनमें से हर चीज़ ने कभी हजारों किलोमीटर का सफर तय किया होगा। कई देशों और सभ्यताओं से होकर गुज़रने के बाद ही यह हमारी रोज़मर्रा की ज़िंदगी का हिस्सा बनी होगी।
हमारा खाना वो सब याद रखता है, जिसे हम भूल चुके हैं। हर निवाले के पीछे एक इतिहास है और हर नाम के पीछे एक लंबा सफर।
स्वाद में छिपा इतिहास: हमारे खाने-पीने की चीजों के नामों में सदियों पुरानी यादें

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