श्रृंगार बत्तीस साल का था और एक बैंक में अच्छी नौकरी करता था। उसके घर में उसकी माँ शारदा, दादी शांता, छोटी बहन शैली, पत्नी शोभा और दस साल की बेटी शांभवी थीं, जिसे सब प्यार से शोना बुलाते थे।
बीस साल पहले, जब श्रृंगार बारह साल का था, उसके पिता का देहांत हो गया था। उस समय घर में तीन औरतें और एक लड़का था। श्रृंगार ने मेहनत से पढ़ाई की, नौकरी हासिल की और घर की जिम्मेदारियाँ सँभालीं। फिर माँ और दादी ने उसकी शादी शोभा से कर दी। शादी के एक साल बाद शोना का जन्म हुआ। इस तरह घर में औरतों की संख्या बढ़कर साढ़े चार हो गई और अकेला मर्द रह गया श्रृंगार!
श्रृंगार अक्सर मजाक में कहता था, “इस घर में साढ़े चार औरतें हैं और एक बेचारा मर्द। पता नहीं मेरी किस्मत में कौन-सा पाप लिखा है!”
एक दिन घर में शैली को देखने के लिए लड़के वाले आने वाले थे। सुबह से ही घर में हलचल मची हुई थी।
शारदा रसोई से आवाज लगा रही थीं, “बेटा, जरा देखना, मिठाई आ गई या नहीं। और हाँ, मेहमानों के लिए पानी की बोतलें फ्रिज में रख देना।”
दादी शांता ने तुरंत ताना मारा, “बहू, लड़की देखने आ रहे हैं या बारात लेकर आ रहे हैं? इतना इंतजाम तो हमने तुम्हारी शादी में भी नहीं किया था!”
शारदा ने पलटकर कहा, “अम्मा, जमाना बदल गया है।”
“हाँ, जमाना तो बदल गया है। अब लड़कियाँ घर का काम सीखने से ज्यादा आईने के सामने बैठना सीखती हैं।”
उधर ऊपर कमरे में श्रृंगार अपनी पत्नी शोभा को तैयार होने में मदद कर रहा था।
शोभा ने गले में हार पहनते हुए पूछा, “श्री, कैसी लग रही हूँ?”
“बहुत सुंदर!”
“बस! इतनी जल्दी जवाब? ठीक से देखिए।”
श्रृंगार ने मुस्कराकर कहा, “मैडम, आप तो रोज ही सुंदर लगती हैं। अब तारीफ के लिए भी कोई नया शब्द ढूँढ़ना पड़ेगा।”
शोभा ने उसकी शर्ट ठीक करते हुए कहा, “अच्छा, अब नीचे जाइए। देखिए, दादी कहीं मेहमानों के सामने कुछ उल्टा-सीधा न बोल दें।”
“और आप?”
“मैं पाँच मिनट में आती हूँ।”
श्रृंगार नीचे पहुँचा तो मेहमान आ चुके थे। शारदा ने सबका स्वागत किया। लड़के का नाम आदित्य था। वह अपने माता-पिता के साथ आया था।
कुछ देर सामान्य बातचीत हुई। फिर शैली को सबके सामने बुलाया गया। शैली ने नमस्ते की और बैठ गई।
दादी ने धीरे से शारदा के कान में कहा, “लड़की तो ठीक लग रही है, बस इसकी जुबान थोड़ी कम चले तो अच्छा है।”
शारदा ने उन्हें आँखों से चुप रहने का इशारा किया।
शैली ने आदित्य की तरफ देखकर पूछा, “आपको खाना बनाना आता है?”
आदित्य थोड़ा चौंका, फिर बोला, “जी, चाय बना लेता हूँ। मैगी और थोड़ा-बहुत खाना भी बना लेता हूँ।”
“अच्छा! मान लीजिए आपकी पत्नी ऑफिस से थकी हुई घर आए, तो क्या आप उसके लिए खाना बनाएँगे?”
आदित्य ने मुस्कराकर जवाब दिया, “बिल्कुल। शादी का मतलब ही है जिम्मेदारियाँ बाँटना।”
शैली ने सिर हिलाया, “अच्छा जवाब है।”
तभी शोना दौड़ती हुई आई और आदित्य के सामने बैठ गई।
“अंकल, आपको पता है, मेरे पापा बहुत अच्छा खाना बनाते हैं। मम्मा थक जाती हैं तो पापा उनके लिए पनीर, पुलाव, पास्ता और कॉफी सब बनाते हैं।”
आदित्य ने हँसकर कहा, “अरे वाह! तो तुम्हारे पापा बहुत अच्छे हैं।”
“हाँ, और मम्मा को खाना भी परोसते हैं।”
शैली ने शोना को आँख दिखाई, लेकिन शोना कहाँ रुकने वाली थी!
आदित्य ने कहा, “मैं भी शादी के बाद तुम्हारी बुआ के साथ बिल्कुल तुम्हारे पापा जैसा व्यवहार करूँगा।”
शोना ने मासूमियत से पूछा, “अच्छा अंकल? इसका मतलब आप बुआ के लिए खाना भी बनाएँगे, उन्हें खाना परोसेंगे, चाय देंगे और रोज रात को उनके पैर भी दबाएँगे, जैसे पापा मम्मा के दबाते हैं?”
कमरे में अचानक सन्नाटा छा गया।
शैली का चेहरा लाल हो गया। शारदा ने खाँसकर बात सँभालने की कोशिश की। आदित्य के माता-पिता एक-दूसरे का चेहरा देखने लगे।
दादी शांता ठहाका लगाकर हँस पड़ीं।
“वाह! बच्ची ने तो शादी के बाद की पूरी नौकरी का ब्यौरा ही बता दिया। अब लड़के वालों को सोचना पड़ेगा कि बहू चाहिए या घर का पूरा काम करने वाला कर्मचारी!”
शोना को समझ नहीं आया कि सब हँस क्यों रहे हैं। वह फिर बोली, “क्या हुआ? पापा तो रोज करते हैं!”
आदित्य के पिता ने बात बदलने की कोशिश की, लेकिन थोड़ी देर बाद उन्होंने जाने की इजाजत माँग ली। शारदा ने उन्हें रोकने की कोशिश की, मगर वे जल्दी में होने का बहाना बनाकर चले गए।
उनके जाते ही शैली ने शोना को घूरा।
“तुम्हें हर बात बताना जरूरी है?”
शोना ने मासूमियत से कहा, “मैंने क्या गलत कहा? पापा सच में तो करते हैं!”
तभी शोभा और श्रृंगार ऊपर से नीचे आए।
शोभा ने पूछा, “मेहमान चले गए?”
शैली ने जवाब दिया, “हाँ भाभी, शोना ने उनका आखिरी इंटरव्यू ले लिया।”
शोना गर्व से बोली, “मैंने सब पूछ लिया!”
शोभा ने श्रृंगार की तरफ देखा और आँखों से इशारा किया। श्रृंगार समझ गया।
शोभा ने कहा, “श्री, जरा ऊपर आइए। मेरी ज्वेलरी उतारने में मदद कर दीजिए।”
शैली हँस पड़ी, “भाभी, अभी तो तैयार होने में एक घंटा लगा था। अब उतरने में कितना समय लगेगा?”
दादी ने भी चुटकी ली, “साड़ी उतारने में इतना समय नहीं लगता, जितना तुम दोनों को ऊपर जाकर बैठक करने में लगता है!”
श्रृंगार बिना जवाब दिए शोभा के पीछे ऊपर चला गया।
करीब एक घंटे बाद दोनों नीचे आए। शैली ने मुस्कराकर पूछा, “भैया, सब ठीक रहा न?”
श्रृंगार ने उसे घूरा।
शोना दौड़कर आई और बोली, “पापा, मेरी ड्रेस बदलवा दीजिए न!”
शोभा ने हँसते हुए कहा, “हाँ, तुम्हारे पापा इस काम में भी बड़े माहिर हैं।”
श्रृंगार ने आसमान की तरफ देखा, जैसे भगवान से पूछ रहा हो कि आखिर उसने कौन-सा अपराध किया था!
कुछ दिन बाद श्रृंगार के बैंक में एक बहुराष्ट्रीय ब्यूटी और वेलनेस कंपनी की तरफ से कुछ ग्राहकों के लिए विशेष ऑफर आया। बैंक के माध्यम से उसे एक मुफ्त ब्यूटी पार्लर कूपन मिला, जिसकी कीमत लगभग तीन हजार रुपये थी।
शाम को घर आकर उसने वह कूपन शोभा को दे दिया।
“ये लो, तुम्हारे लिए एक छोटा-सा तोहफा।”
शोभा खुश होकर बोली, “अरे वाह! श्री, आप भी कभी-कभी बड़े रोमांटिक हो जाते हैं।”
श्रृंगार ने मुस्कराकर कहा, “कभी-कभी नहीं, हमेशा। बस आपको दिखाई देर से देता है।”
अगली सुबह शोना ने कूपन देख लिया और दौड़कर शैली के पास पहुँच गई।
“बुआ, पापा मम्मा को तीन हजार रुपये वाला ब्यूटी पार्लर कूपन देकर आए हैं!”
शैली तुरंत शोभा के पास पहुँची।
“भाभी, वो कूपन मुझे दे दीजिए।”
शोभा ने पूछा, “तुम्हें क्यों?”
“क्योंकि मेरी शादी अभी होनी है। मुझे बाजार में उतरने से पहले थोड़ी तैयारी करनी पड़ेगी।”
शोभा ने कूपन अपने हाथ में कसकर पकड़ लिया।
“श्री ने मुझे दिया है, इसलिए ये मेरा है।”
शैली बोली, “भाभी, आपकी शादी तो हो चुकी है। अब आपको और कितना सुंदर बनना है?”
शोभा ने जवाब दिया, “सुंदरता की कोई सीमा नहीं होती, समझीं?”
तभी शारदा भावुक होकर बोलीं, “मेरी बेटी शैली को भी कभी कुछ मिलना चाहिए। सारी जिंदगी उसने घर में ही तो बिताई है। उसकी खुशियों का भी ध्यान रखना चाहिए।”
श्रृंगार ने बीच में कहा, “माँ, कोई बात नहीं। मैं कोशिश करूँगा कि एक और कूपन मिल जाए।”
शैली ने तुरंत कहा, “नहीं भैया, मुझे यही चाहिए।”
दादी शांता ने ताना मारा, “वाह! तीन हजार के कागज ने पूरे घर में महाभारत करवा दी। हमारे जमाने में औरतें घर बसाती थीं, आजकल कूपन के लिए घर सिर पर उठा लेती हैं।”
तभी शोना भी कूपन की तरफ हाथ बढ़ाने लगी।
“मुझे भी चाहिए! मैं भी मम्मा और बुआ जैसा फेशियल करवाऊँगी।”
शोभा ने हैरानी से पूछा, “तुम्हें फेशियल क्यों करवाना है?”
“ताकि मैं भी सुंदर दिखूँ!”
शैली ने हँसकर कहा, “पहले दूध पीना सीख ले, फिर फेशियल करवाना।”
बस, फिर क्या था! शोभा ने कूपन पकड़ा, शैली ने दूसरा कोना खींचा और शोना भी बीच में कूद पड़ी। श्रृंगार उन्हें रोकता रह गया, लेकिन कूपन दो टुकड़ों में फट गया।
कुछ पल तक सब चुप रहे।
श्रृंगार ने दोनों टुकड़े उठाकर देखे और बोला, “तीन हजार रुपये का मुफ्त इलाज था। न किसी का फेशियल हुआ, न किसी की सुंदरता बढ़ी। उल्टा कूपन का अंतिम संस्कार हो गया!”
दादी बोलीं, “कोई बात नहीं बेटा। अब कम से कम सब बराबर हैं। किसी को सुंदर बनने का मौका नहीं मिला!”
श्रृंगार ने लंबी साँस ली।
“मुझे लगता है मेरा तबादला किसी लड़कों के हॉस्टल में करवा लेना चाहिए। वहाँ कम से कम कूपन के लिए कोई लड़ाई तो नहीं करेगा!”
एक सुबह श्रृंगार की नींद खुली तो घर में हमेशा की तरह आवाजें गूँज रही थीं।
शारदा बोलीं, “बेटा, तुम्हारे पापा होते तो आज तुम्हें देखकर कितने खुश होते। उन्होंने भी घर के लिए बहुत मेहनत की थी।”
दादी ने तुरंत कहा, “बहू, सुबह-सुबह लड़के को भावुक मत करो। इसे ऑफिस भी जाना है।”
शैली कमरे में आई और बोली, “भैया, आज भी भाभी के इशारों पर नाचने की तैयारी है?”
श्रृंगार ने कहा, “तुम्हें सुबह-सुबह कोई और काम नहीं मिलता?”
शोभा ने हाथ में कामों की सूची पकड़ाते हुए कहा, “श्री, ऑफिस जाते समय दूध लेते आइएगा। लौटते हुए ड्राई क्लीनिंग से कपड़े ले लीजिएगा। और हाँ, शाम को शोना को डांस क्लास से भी लाना है।”
शोना दौड़कर आई।
“पापा, मेरे लिए आइसक्रीम भी लाना!”
श्रृंगार ने सबकी तरफ देखा। किसी को उससे कुछ न कुछ चाहिए था। किसी ने यह नहीं पूछा कि वह कैसा है, क्या चाहता है या कभी उसे भी आराम की जरूरत होती है।
वह चुपचाप तैयार होकर ऑफिस चला गया।
उस दिन बैंक में भी उसका मन नहीं लगा। घर लौटने के बाद रात को उसने कागज उठाया और एक लंबा पत्र लिखना शुरू किया।
“मैं इस घर में सबके लिए कुछ न कुछ हूँ। माँ का बेटा, दादी का पोता, शैली का भाई, शोभा का पति और शोना का पापा। लेकिन क्या मैं सिर्फ रिश्तों का नाम हूँ? क्या मेरी अपनी कोई इच्छा नहीं है? क्या कभी कोई मुझसे पूछेगा कि मैं कैसा हूँ? मैं भी थकता हूँ। मुझे भी कभी अकेले बैठने, अपनी मर्जी से कुछ करने और अपने लिए समय निकालने का मन करता है।”
उसने आगे लिखा, “मैं किसी से नाराज नहीं हूँ, लेकिन अब थोड़ा थक गया हूँ। हर दिन सबकी उम्मीदें पूरी करने की कोशिश करता हूँ। शायद मुझे भी कुछ समय अपने लिए चाहिए।”
पत्र लिखकर उसने उसे शोभा की ड्रेसिंग टेबल पर रख दिया।
अगली सुबह शोना दूध पीते हुए कमरे में आई। उसने पानी का गिलास उठाया, लेकिन हाथ से पानी पत्र पर गिर गया। कागज का आखिरी हिस्सा पूरी तरह भीग गया और लिखे हुए शब्द फैल गए।
श्रृंगार उस समय घर से निकल चुका था। उसने मन ही मन तय किया था कि आज का दिन सिर्फ अपने लिए होगा। वह एक मनोरंजन पार्क जाने वाला था। उसके मन में एक ही बात थी—छह दिन परिवार के लिए और एक दिन अपने लिए!
कुछ देर बाद शोभा की नजर पत्र पर पड़ी। उसने उसे उठाकर पढ़ना शुरू किया। जैसे-जैसे वह पढ़ती गई, उसके चेहरे का रंग उड़ता गया। आखिरी पैराग्राफ पानी में भीगकर मिट चुका था।
शोभा ने घबराकर शारदा और शैली को बुलाया।
“श्री ने ये क्या लिखा है? वह इतने परेशान थे और हममें से किसी को पता तक नहीं चला!”
शैली ने पत्र पढ़ा तो उसकी आँखें भर आईं।
“भाभी, भैया ने कभी हमसे कुछ नहीं माँगा। हम सब उनसे बस अपनी-अपनी बातें मनवाते रहे।”
शारदा रोने लगीं।
“मैंने तो हमेशा उसे अपने दुख और अपनी कुर्बानियों की बातें सुनाईं। कभी ये नहीं पूछा कि वह खुद कितना परेशान है।”
दादी शांता भी चुप हो गईं। उन्होंने धीमी आवाज में कहा, “हमने उसके अच्छे स्वभाव को उसकी मजबूरी समझ लिया। वह सबका ध्यान रखता रहा और हम समझते रहे कि उसे किसी चीज की जरूरत ही नहीं।”
शोना भी रोने लगी।
“मम्मा, ये पानी मुझसे गिरा था। मैंने पापा का पत्र खराब कर दिया। पापा कहाँ गए हैं?”
शोभा ने उसे गले लगा लिया।
“बेटा, तुमने जानबूझकर नहीं किया। लेकिन हमें पापा को ढूँढ़ना होगा।”
सबने श्रृंगार को फोन किया। उसका फोन बंद था। बैंक में पता किया, दोस्तों को फोन किया, रिश्तेदारों से पूछा, लेकिन किसी को कुछ पता नहीं था।
घर की पाँचों औरतें घबरा गईं। अब तक उन्हें एहसास हो चुका था कि श्रृंगार उनके लिए कितना जरूरी था।
उधर श्रृंगार मनोरंजन पार्क में घूम रहा था। उसने सबसे पहले आइसक्रीम खरीदी। एक निवाला लेते ही उसे शोना याद आ गई।
“ये होती तो आधी आइसक्रीम खुद खा जाती और बाकी आधी मेरे कपड़ों पर गिरा देती।”
वह आगे बढ़ा और बंपर कारों में बैठ गया। गाड़ियाँ एक-दूसरे से टकराने लगीं तो उसे शैली याद आ गई।
“ये भी बिल्कुल ऐसी ही है। जहाँ मौका मिले, भैया को टक्कर मार देती है।”
फिर वह वाटर पार्क में गया। पानी में भीगते हुए उसे शोभा याद आई।
“अगर शोभा यहाँ होती तो पहले मुझे पानी में धकेलती और फिर खुद किनारे बैठकर हँसती।”
दोपहर में उसने खाना खाया। खाना खाते हुए उसे माँ शारदा की याद आई।
“माँ होती तो कहतीं, बेटा एक रोटी और खा ले। ऑफिस में पता नहीं ठीक से खाना मिलता भी है या नहीं।”
खाने के बाद उसने पान लिया तो दादी याद आ गईं।
“दादी होतीं तो कहतीं, पान खाने से पहले दाँतों का भी ख्याल रखा कर।”
वह मुस्कराया, लेकिन अगले ही पल उसका मन उदास हो गया। वह अकेला था। जिनसे कुछ समय दूर रहने के लिए निकला था, वही हर पल उसके साथ थीं। उसे समझ आया कि वह उनसे नाराज जरूर था, लेकिन उनके बिना खुश नहीं रह सकता था।
शाम को घर में सभी लोग लौट आए। श्रृंगार का कहीं पता नहीं चला था।
शोभा सोफे पर बैठी रो रही थी।
“मैंने कभी नहीं पूछा कि श्री को क्या चाहिए। बस अपनी जरूरतें बताती रही।”
शैली ने कहा, “मैं भी हमेशा भैया को चिढ़ाती रही। कभी सोचा ही नहीं कि उन्हें बुरा भी लग सकता है।”
शारदा बोलीं, “मैंने हर बात पर अपनी कुर्बानियाँ गिनाईं। बेटा सबके लिए करता रहा और मैं उससे और उम्मीद करती रही।”
दादी ने भारी आवाज में कहा, “मैं भी हर वक्त ताने मारती रही। उसकी अच्छाइयों की तारीफ कभी नहीं की।”
शोना अपने पापा की तस्वीर सीने से लगाकर रोने लगी।
“मुझे कुछ नहीं चाहिए। बस मेरे पापा घर आ जाएँ।”
रात के करीब साढ़े आठ बजे दरवाजे की घंटी बजी।
शोना सबसे पहले दौड़ी। दरवाजा खुलते ही सामने श्रृंगार खड़ा था। उसके हाथ में मनोरंजन पार्क का एक छोटा-सा बैग था।
“पापा!”
शोना उससे लिपट गई। पीछे से शोभा, शारदा, शैली और दादी भी आ गईं। सबने उसे घेर लिया। किसी की आँखों में आँसू थे, कोई उसे गले लगाकर रो रहा था।
श्रृंगार घबरा गया।
“अरे, क्या हुआ? सब रो क्यों रहे हो?”
शोभा ने काँपती आवाज में पूछा, “श्री, आप कहाँ चले गए थे? हमें कितना डरा दिया आपने!”
श्रृंगार ने सबको देखा। फिर उसकी नजर ड्रेसिंग टेबल पर पड़े भीगे हुए पत्र पर गई।
“अरे! तुम लोगों ने ये पत्र पढ़ लिया?”
शारदा ने कहा, “बेटा, तुम इतने परेशान थे और हमें पता तक नहीं चला।”
श्रृंगार ने सबको बैठाया और समझाया, “अरे, मैंने ऐसा कुछ नहीं किया। मुझे बस एक दिन अपने लिए चाहिए था। मैं मनोरंजन पार्क गया था। पत्र का आखिरी हिस्सा पानी से खराब हो गया होगा। उसमें लिखा था—छह दिन परिवार के लिए और एक दिन अपने लिए।”
शोना रोते हुए बोली, “पापा, पानी मुझसे गिर गया था। मुझे माफ कर दीजिए।”
श्रृंगार ने उसे गोद में उठाकर माथा चूम लिया।
“अरे मेरी गुड़िया, इसमें तुम्हारी क्या गलती? तुमने जानबूझकर थोड़े ही किया था।”
सबकी जान में जान आई।
कुछ देर बाद घर का माहौल फिर सामान्य होने लगा।
शारदा बोलीं, “बेटा, तुमने खाना खाया? सुबह से कुछ खाया भी होगा या नहीं? तुम्हारे पापा भी ऐसे ही अपनी सेहत का ध्यान नहीं रखते थे।”
श्रृंगार ने मुस्कराकर कहा, “माँ, अभी तो आया हूँ!”
शोभा ने आदेश दिया, “श्री, ऊपर जाकर मेरे लिए चाय और कुछ नाश्ता ले आइए।”
श्रृंगार ने उसकी तरफ देखा।
शैली हँसकर बोली, “भैया, वापस आ गए जोरू के गुलाम!”
दादी ने भी ताना मारा, “आधे दिन की बहादुरी! गए थे राजा बनकर, लौटे हो नौकर बनकर!”
शोना ने श्रृंगार का हाथ पकड़ लिया।
“पापा, अगली बार मुझे भी मनोरंजन पार्क ले चलना।”
श्रृंगार हँस पड़ा।
“बिल्कुल, लेकिन इस बार आइसक्रीम के पैसे तुम्हें अपनी गुल्लक से देने होंगे।”
“नहीं पापा, वो तो आप ही देंगे!”
रात को श्रृंगार और शोभा बालकनी में बैठे थे। शोभा ने उसका हाथ पकड़कर कहा, “श्री, मुझे माफ कर दीजिए। मैं आपको इतना अपना समझने लगी थी कि आपकी थकान देखना ही भूल गई।”
श्रृंगार ने मुस्कराकर कहा, “कोई बात नहीं। बस कभी-कभी मुझसे भी पूछ लिया करो कि मैं कैसा हूँ।”
तभी शैली वहाँ आ गई।
“भैया, अब से आपको कम परेशान करूँगी।”
पीछे से दादी की आवाज आई, “बड़ी आई कम परेशान करने वाली! इसे कोई नहीं सुधार सकता।”
शारदा फल की प्लेट लेकर आ गईं।
“बेटा, ये फल खा लो। दिन भर घूमकर आए हो।”
शोना दौड़कर श्रृंगार से लिपट गई।
“पापा, आई लव यू!”
श्रृंगार ने उसे गले लगा लिया।
उसने चारों तरफ देखा। वही घर था, वही आवाजें थीं, वही ताने थे और वही फरमाइशें थीं। लेकिन आज उसे एहसास हो रहा था कि इन सबके बीच उसकी अपनी जगह कितनी खास थी।
वह इन सबका बेटा, पोता, भाई, पति और पिता था। वह इस घर को जोड़ने वाली कड़ी था। उसकी जिंदगी में शोर बहुत था, शिकायतें बहुत थीं और जिम्मेदारियाँ भी बहुत थीं, लेकिन इन सबके बीच प्यार भी उतना ही था।
उसने मन ही मन सोचा—घर में सुकून होना अच्छी बात है, लेकिन उससे भी जरूरी है ऐसे लोग होना, जिनके बिना जिंदगी अधूरी लगे।
साढ़े चार औरतों का श्रृंगार

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