कल्पना कीजिए कि दो व्यक्तियों का जन्म केवल कुछ सेकंड के अंतर से हुआ है। एक का जन्म 31 दिसंबर 1996 को हुआ और दूसरे का 1 जनवरी 1997 को। प्रचलित पीढ़ीगत वर्गीकरण के अनुसार, पहला व्यक्ति मिलेनियल पीढ़ी का सदस्य होगा, जबकि दूसरा जनरेशन Z का। लेकिन क्या केवल कुछ सेकंड का अंतर वास्तव में उन्हें दो अलग-अलग पीढ़ियों का सदस्य बना देता है?
दोनों व्यक्तियों के बचपन के अनुभव, सामाजिक परिवेश और सांस्कृतिक प्रभाव लगभग समान हो सकते हैं। इसके बावजूद, केवल जन्म-वर्ष की एक सीमा उन्हें अलग-अलग पीढ़ियों में बाँट देती है। यह उदाहरण दर्शाता है कि पीढ़ियों को निश्चित जन्म-वर्षों के आधार पर वर्गीकृत करना कितना मनमाना हो सकता है।
पीढ़ियों को समझने के लिए जन्म-वर्षों से अधिक महत्त्वपूर्ण वे साझा ऐतिहासिक अनुभव हैं, जिन्होंने लोगों के जीवन को आकार दिया। किसी ऐतिहासिक घटना का प्रभाव इस बात पर निर्भर करता है कि व्यक्ति ने उसका अनुभव किस उम्र में किया और उस समय उसकी सामाजिक परिस्थितियाँ कैसी थीं।
कोविड-19 महामारी और एक पीढ़ी का निर्माण
कोविड-19 महामारी ने दुनिया भर में शिक्षा, रोजगार, सामाजिक संबंधों और पारिवारिक जीवन को प्रभावित किया। विशेष रूप से स्कूली बच्चों और किशोरों के लिए इसने उनके जीवन के महत्त्वपूर्ण वर्षों को बदल दिया।
स्कूल बंद हो गए, ऑनलाइन शिक्षा सामान्य हो गई और मित्रों के साथ व्यक्तिगत मेल-जोल सीमित हो गया। हालाँकि, महामारी का अनुभव सभी उम्र के लोगों के लिए एक जैसा नहीं था।
2020 में छह वर्ष का बच्चा और सोलह वर्ष का किशोर दोनों स्कूली शिक्षा प्राप्त कर रहे थे, लेकिन महामारी का उनके जीवन पर अलग-अलग प्रभाव पड़ा होगा। छोटे बच्चे की शुरुआती शिक्षा और सामाजिक विकास प्रभावित हुआ होगा, जबकि किशोर को परीक्षाओं, उच्च शिक्षा और भविष्य की योजनाओं से जुड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ा होगा।
इसी आधार पर 2004 से 2014 के बीच जन्मे बच्चों को उन लोगों के एक मूल समूह के रूप में देखा जा सकता है, जिन्होंने महामारी के दौरान अपने स्कूली जीवन में व्यवधान का अनुभव किया।
यह सीमा पूर्ण या अंतिम नहीं है। 2004 से पहले जन्मे कई लोगों की शिक्षा भी महामारी से प्रभावित हुई होगी, जबकि 2014 के बाद जन्मे बच्चों ने भी इसके प्रभावों का अनुभव किया होगा। देश, समुदाय और व्यक्तिगत परिस्थितियों के अनुसार अनुभव अलग-अलग रहे।
इस वर्गीकरण का उद्देश्य एक ऐसे मूल समूह की पहचान करना है, जिसने अपने विकास के महत्त्वपूर्ण चरणों में महामारी का सामना किया।
11 सितंबर 2001 के हमले और शुरुआती 2000 का दशक
11 सितंबर 2001 को अमेरिका में हुए आतंकवादी हमलों ने अंतरराष्ट्रीय राजनीति और सुरक्षा संबंधी नीतियों को गहराई से प्रभावित किया। इसके बाद अफगानिस्तान और इराक में युद्ध हुए तथा आतंकवाद और राष्ट्रीय सुरक्षा वैश्विक राजनीतिक विमर्श के प्रमुख विषय बन गए।
भारत में भी दिसंबर 2001 में संसद पर आतंकवादी हमला हुआ, जिसने राष्ट्रीय सुरक्षा और क्षेत्रीय तनाव से संबंधित चिंताओं को बढ़ाया।
इसी अवधि में तकनीकी परिवर्तन भी तेजी से हो रहे थे। मोबाइल फोन अधिक प्रचलित होने लगे, इंटरनेट का विस्तार हुआ और कंप्यूटर शिक्षा तथा संचार का महत्त्वपूर्ण हिस्सा बनने लगे।
इन परिवर्तनों के बीच बड़े होने वाले बच्चों और किशोरों ने एक ऐसी दुनिया का अनुभव किया, जिसमें राजनीतिक अस्थिरता और तकनीकी विकास दोनों साथ-साथ आगे बढ़ रहे थे।
2001 में छह वर्ष का बच्चा इन घटनाओं को मुख्यतः परिवार, टेलीविजन और अपने आसपास के वातावरण के माध्यम से समझता होगा। वहीं, सोलह वर्ष का किशोर इनके राजनीतिक और सामाजिक परिणामों को अधिक स्पष्ट रूप से समझ सकता था।
दोनों ने एक ही ऐतिहासिक दौर का अनुभव किया, लेकिन उनकी उम्र और समझ के स्तर ने उस अनुभव को अलग-अलग रूप दिया।
इस आधार पर 1985 से 1995 के बीच जन्मे लोगों को उस मूल समूह के रूप में देखा जा सकता है, जिसने 9/11 और शुरुआती 2000 के दशक के राजनीतिक तथा तकनीकी परिवर्तनों का अनुभव अपने स्कूली जीवन के दौरान किया।
यह सीमा भी केवल एक प्रस्ताव है। इससे पहले या बाद में जन्मे लोगों ने भी इन घटनाओं का अनुभव किया होगा। पीढ़ीगत अनुभव किसी निश्चित जन्म-वर्ष सीमा तक सीमित नहीं होते।
पीढ़ियों की सीमाएँ लचीली क्यों होनी चाहिए?
कोविड-19 महामारी और 9/11 के उदाहरण बताते हैं कि विभिन्न ऐतिहासिक घटनाएँ लोगों को अलग-अलग उम्र में प्रभावित करती हैं। इसलिए हर घटना के आधार पर पीढ़ीगत सीमाएँ अलग हो सकती हैं।
किसी युद्ध, आर्थिक संकट, महामारी या तकनीकी क्रांति का प्रभाव इस बात पर निर्भर करता है कि व्यक्ति अपने जीवन के किस चरण में है। बचपन में अनुभव की गई घटना का प्रभाव किशोरावस्था या वयस्कता में अनुभव की गई उसी घटना से अलग हो सकता है।
इसलिए पीढ़ियों को परिभाषित करने के लिए एक ही सार्वभौमिक जन्म-वर्ष सीमा का उपयोग करना पर्याप्त नहीं है। इसके बजाय, उन लोगों के मूल समूहों की पहचान की जानी चाहिए, जिन्होंने किसी विशेष ऐतिहासिक घटना का अपने जीवन के समान चरण में अनुभव किया।
ऐसी सीमाएँ लचीली होनी चाहिए और एक-दूसरे से कुछ हद तक मेल भी खा सकती हैं। एक व्यक्ति एक ऐतिहासिक घटना के संदर्भ में एक पीढ़ीगत समूह से जुड़ सकता है और किसी दूसरी घटना के संदर्भ में दूसरे समूह से।
निष्कर्ष
पीढ़ियों के प्रचलित नाम और जन्म-वर्षों पर आधारित वर्गीकरण व्यापक सामाजिक तथा जनसांख्यिकीय प्रवृत्तियों को समझने में उपयोगी हो सकते हैं। समस्या तब पैदा होती है, जब इन वर्गीकरणों को कठोर और प्राकृतिक सीमाओं के रूप में देखा जाने लगता है।
31 दिसंबर 1996 को जन्मा व्यक्ति केवल इसलिए 1 जनवरी 1997 को जन्मे व्यक्ति से मूलतः अलग नहीं हो जाता कि दोनों जन्म-वर्ष की सीमा के अलग-अलग ओर आते हैं।
जन्म-वर्ष किसी व्यक्ति की समयगत स्थिति बताते हैं, लेकिन साझा अनुभव यह समझने में मदद करते हैं कि किसी ऐतिहासिक दौर ने उसके जीवन को किस प्रकार प्रभावित किया।
इसलिए पीढ़ियों का अध्ययन करते समय जन्म-वर्षों के साथ-साथ ऐतिहासिक घटनाओं, सामाजिक परिस्थितियों और जीवन के विकासात्मक चरणों को भी महत्त्व देना चाहिए।
क्या पीढ़ियों को साझा ऐतिहासिक अनुभवों के आधार पर परिभाषित करना अधिक उचित होगा? क्या 1985–1995 और 2004–2014 की प्रस्तावित सीमाएँ क्रमशः 9/11 के दौर और कोविड-19 महामारी से प्रभावित समूहों को समझने में उपयोगी हैं?
और किन अन्य ऐतिहासिक घटनाओं, राजनीतिक परिवर्तनों या तकनीकी विकासों ने विशेष पीढ़ियों के निर्माण में निर्णायक भूमिका निभाई है?
इन प्रश्नों पर विचार करके हम पीढ़ियों को केवल जन्म-वर्षों के लेबल के रूप में देखने के बजाय साझा ऐतिहासिक अनुभवों के माध्यम से बेहतर ढंग से समझ सकते हैं।
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