देर दोपहर की धूप बैठक के कमरे में ठहरी हुई थी।
सरोज आराम से सोफ़े पर पसरी हुई थी। उसका भरा-पूरा शरीर कुशन में धँसा हुआ था। उसकी साड़ी पारंपरिक अंदाज़ और आधुनिक स्लीवलेस ब्लाउज़ का मेल थी। बाल ठीक करने के लिए जब उसने हाथ उठाया, तो उसकी ऊपरी बाँह पर बना टैटू साफ़ दिखाई दिया
आरव।
उसके सामने आरव खड़ा था—लगभग छह फुट लंबा, गोरा रंग और हल्के नैन-नक्श। उसके टैंक टॉप से उसके कंधे और बाँहें दिखाई दे रही थीं, जिनमें से एक पर बना टैटू साफ़ था
सरोज।
वह लगभग एक मिनट से वहीं खड़ा था।
“सरोज जी, मैं कुछ कहना चाहता था”
सरोज की नज़र आरव से हटकर सेंटर टेबल पर रखे खाली कप पर चली गई।
“पहले वो।”
आरव ने उसकी नज़र का पीछा किया।
उसका खाली कप वहीं पड़ा था।
“जी।”
वह कप उठाकर रसोई की ओर चला गया। सोफ़े के पास से गुजरते हुए सरोज ने देखा कि एक कुशन अपनी जगह से खिसका हुआ था।
“सुनिए।”
आरव रुक गया।
सरोज ने बस कुशन की ओर इशारा किया।
उसने कुशन ठीक किया, उसकी ओर एक नज़र डाली और फिर रसोई में चला गया।
एक मिनट बाद वह धुला हुआ कप लेकर लौटा और उसे उसकी जगह पर रख दिया।
सरोज ने हल्के से सिर हिला दिया।
आरव उसके सामने खड़ा रहा।
“सुनिए?”
सरोज ने फ़ोन से नज़र उठाई।
“क्या?”
“मैं आपसे कुछ पूछना चाहता था।”
उसने फ़ोन एक तरफ़ रख दिया।
“इधर बैठिए।”
आरव उसके पास बैठ गया, दोनों के बीच थोड़ा फ़ासला था।
कुछ देर बाद उसने सरोज की बाँह पकड़ ली।
“आपके कंधे कड़े हो रहे हैं।”
सरोज ने उसे अपनी बाँह दबाने दी।
वह धीरे-धीरे उसकी बाँह दबाने लगा।
“सरोज जी?”
“हूँ?”
“क्या मैं आज रात रोहन की पार्टी में जा सकता हूँ?”
उसकी नज़र अब भी टीवी पर थी।
“उसका जन्मदिन है।”
“हूँ।”
“ऑफ़िस के सब लोग आएँगे।”
“हूँ।”
“विक्रम भी आ रहा है।”
सरोज ने कोई जवाब नहीं दिया।
आरव उसकी बाँह दबाता रहा।
“प्लीज़?”
कोई प्रतिक्रिया नहीं।
वह थोड़ा और पास झुका।
“मैं जल्दी वापस आ जाऊँगा।”
सरोज ने आखिर उसकी ओर देखा।
दोनों की आँखें मिलीं।
“नहीं।”
आरव के हाथ धीमे पड़ गए।
“जी।”
वह कुछ और कहने की उम्मीद में रुका रहा।
सरोज ने फिर फ़ोन उठा लिया।
आरव ने नज़रें झुका लीं।
“ठीक है।”
वह उठने लगा।
वह मुश्किल से एक कदम ही आगे बढ़ा था कि सरोज सोफ़े पर थोड़ा खिसकी।
उसने अपना पैर उसकी ओर बढ़ा दिया।
आरव रुक गया।
उसने उसकी ओर देखा।
सरोज ने अधीरता से हल्का-सा इशारा किया।
आरव के कंधे ढीले पड़ गए।
“जी।”
वह सोफ़े के पास नीचे बैठ गया और उसकी पिंडली दबाने लगा।
सरोज फ़ोन देखती रही।
कुछ देर बाद उसने नीचे देखा।
“दूसरी तरफ़।”
आरव दूसरी टाँग की ओर चला गया।
“जी।”
सरोज के होंठों के कोने पर हल्की मुस्कान आई।
आरव ने देख लिया।
“क्या मज़ेदार है?”
“कुछ नहीं।”
“आप मुस्कुरा रही हैं।”
“ठीक से दबाइए।”
आरव ने साँस छोड़ी और फिर दबाने लगा।
“जी।”
कमरे में फिर शांति छा गई।
कुछ मिनट बाद सरोज ने फ़ोन नीचे रखा।
“सुनिए।”
“जी?”
“थोड़ा ज़ोर से।”
उसने अपने हाथों का दबाव बढ़ा दिया।
“ऐसे?”
सरोज ने सिर हिलाया।
“हूँ।”
आरव ने उसकी ओर देखा।
“तो… पक्का नहीं?”
सरोज ने उसकी आँखों में देखा।
आरव ने तुरंत नज़रें नीचे कर लीं।
“जी।”
“पक्का।”
आरव ने हल्की साँस छोड़ी और उसकी टाँग दबाता रहा।
“जी।”
—
सुबह की चाय
सुबह की धूप पर्दों से छनकर कमरे में आ रही थी।
आरव हाथ में ट्रे लिए कमरे में आया।
“चाय, सरोज जी।”
सरोज अभी नाइट ड्रेस में बैठी थी। उसके गले में लंबा मंगलसूत्र था और दोनों कलाइयों में ढेर सारी चूड़ियाँ थीं, जो कप उठाते समय हल्की-सी छनक उठीं।
आरव ने ट्रे उसके सामने रख दी।
उसने कप उठाया और मुस्कुराई।
“थैंक यू, हबी।”
आरव का चेहरा खिल उठा।
वह उसके पीछे गया और धीरे-धीरे उसके कंधे दबाने लगा।
“अपनी वाइफ़ी को और खुश कर दूँ।”
सरोज चाय पीते हुए मुस्कुराई।
आरव ने कुछ पल इंतज़ार किया।
फिर सहजता से बोला—
“वाइफ़ी…”
“हूँ?”
“आपको पता है पेट्रोल महँगा हो गया है।”
“हूँ।”
“और बाकी चीज़ें भी महँगी होती जा रही हैं।”
सरोज ने एक और घूँट लिया।
आरव ने उसके कंधे थोड़े और उत्साह से दबाए।
“क्या आपको नहीं लगता कि आपके गरीब हबी की पॉकेट मनी थोड़ी बढ़नी चाहिए?”
सरोज के होंठ हल्के से हिले।
उसने कुछ नहीं कहा।
“बहुत थोड़ी।”
खामोशी।
“बस ज़रा-सी।”
आखिर उसने सिर घुमाकर उसकी ओर देखा।
आरव ने मासूम चेहरा बना लिया।
“आपकी पॉकेट मनी बिल्कुल सही है, मेरे प्रिय।”
“लेकिन—”
“आप मुझसे और पैसे माँग सकते हैं।”
आरव रुक गया।
यह बात तकनीकी रूप से सही थी।
वह माँग सकता था।
फिर वही सवाल आता
किसलिए?
और उसके बाद रसीदें।
उसके बिना हिसाब वाले खर्चों की सीमा पाँच हज़ार रुपये महीना थी। उससे ज़्यादा खर्च करने पर मामला बड़ी आसानी से हिसाब-किताब की बैठक में बदल जाता था।
उसने फिर कोशिश की।
“लेकिन वाइफ़ी, पाँच हज़ार में तो मुश्किल से”
सरोज ने एक हाथ उठा दिया।
उसकी चूड़ियाँ हल्के से छनकीं।
“बस।”
आरव का मुँह बंद हो गया।
“अब कोई चर्चा नहीं।”
उसने गंभीरता से सिर हिलाया।
“ठीक है, सरोज जी।”
सरोज फिर अपनी चाय की ओर मुड़ गई और अपनी मुस्कान छिपाने लगी।
आरव उसके कंधे दबाता रहा।
कुछ देर बाद वह बुदबुदाया,
“पेट्रोल सच में बहुत महँगा है।”
सरोज के कंधे हल्के-से हिलने लगे।
वह हँस रही थी।
आरव भी मुस्कुरा दिया।
कम-से-कम वह उसे हँसा तो पाया था।
बजट बाद में देखा जाएगा।
—
वह खबर
आरव अपनी कॉफ़ी का आधा कप ही पी पाया था कि सरोज कमरे में आई।
उसकी मुस्कान में कुछ अलग था।
“सुनिए।”
आरव ने सिर उठाया।
“जी?”
वह उसके सामने खड़ी रही, दोनों हाथ सामने जोड़कर।
“मुझे आपसे कुछ कहना है।”
आरव ने कप नीचे रख दिया।
“क्या हुआ?”
सरोज मुस्कुराई।
“मैं डॉक्टर के पास गई थी।”
उसके चेहरे पर तुरंत चिंता आ गई।
“सब ठीक है?”
उसने सिर हिलाया।
“सब ठीक है।”
वह उसके पास आई।
“मैं प्रेग्नेंट हूँ।”
एक पल के लिए आरव बस उसे देखता रहा।
फिर उसका चेहरा खुशी से खिल उठा।
“सच?”
सरोज ने सिर हिलाया।
“हमारे घर बच्चा आने वाला है।”
आरव इतनी तेजी से खड़ा हुआ कि उसकी कुर्सी पीछे खिसक गई।
“बधाई हो, सरोज जी।”
उसने उसे बाँहों में भर लिया।
सरोज हल्के से हँसी और उसने भी उसे गले लगा लिया।
“मुझे पता था आप खुश होंगे।”
“बिल्कुल खुश हूँ।”
कुछ देर उसे बाँहों में रखने के बाद वह थोड़ा पीछे हुआ।
फिर उसने उसके माथे पर चूमा।
“बधाई हो, वाइफ़ी।”
सरोज की आँखों में चमक थी।
“बधाई हो, हबी।”
दोनों एक-दूसरे को देखकर मुस्कुराए।
आरव ने धीरे से अपना हाथ उसके पेट पर रख दिया।
“सच में बच्चा है?”
सरोज ने अपना हाथ उसके हाथ के ऊपर रख दिया।
“हाँ।”
वह फिर मुस्कुराया।
लेकिन भीतर उसके चेहरे की निश्चितता धीरे-धीरे धुँधली पड़ने लगी।
एक बच्चा।
यह शब्द अचानक कुछ ही पल पहले से कहीं बड़ा लगने लगा था।
उसके दिमाग में सवाल दौड़ने लगे।
डॉक्टर।
अस्पताल।
खर्चे।
नींद से भरी रातें।
ज़िम्मेदारियाँ।
एक छोटा-सा इंसान, जो उस पर निर्भर होगा।
उसने सरोज की ओर देखा।
वह खुशी से चमक रही थी।
आरव उस खुशी को छेड़ना नहीं चाहता था।
सरोज ने अपना सिर उसके सीने पर रख दिया।
आरव ने उसे फिर बाँहों में भर लिया।
“मैं बहुत खुश हूँ,” उसने धीरे से कहा।
सरोज मुस्कुराई।
आरव ने आँखें बंद कर लीं।
वह खुश था।
यह सच था।
बस उसे यह समझ नहीं आ रहा था कि खुशी के साथ इतना डर भी क्यों आ रहा था।
—
आरव जी
बदलाव रातों-रात नहीं आया।
शुरुआत छोटी-छोटी बातों से हुई।
“सुनिए।”
आवाज़ रसोई से आई।
आरव ने लैपटॉप से नज़र उठाई।
“जी?”
सरोज दरवाज़े पर दिखाई दी।
उसके हाथ में कॉफ़ी का कप था।
उसने कप लैपटॉप के पास रखा।
“दो घंटे से काम कर रहे हैं। ठंडी होने से पहले पी लीजिए।”
आरव ने कप देखा।
फिर उसकी ओर देखा।
“थैंक यू।”
सरोज ने उसके कंधे पर हल्का हाथ रखा और जाने लगी।
आरव उसे देखता रहा।
दरवाज़े पर पहुँचकर वह रुक गई।
“आरव जी।”
आरव ने सिर उठाया।
“जी?”
“दोपहर का खाना मत छोड़िएगा।”
वह मुस्कुराया।
“जी।”
सरोज भी मुस्कुराई।
—
सुबह की दिनचर्या भी बदल गई।
बेड टी के समय कभी-कभी सरोज उसके पीछे बैठती और अपनी उँगलियों से उसके कंधे धीरे-धीरे दबाती।
आरव हँस देता।
“नहीं, सरोज जी। मैं ठीक हूँ।”
वह फिर भी दबाती रहती।
“आरव जी, जब से मैं प्रेग्नेंट हुई हूँ, आपको घंटों मेरे पैर दबाने पड़ते हैं। आपके हाथ भी थकते होंगे।”
आरव ने सिर घुमाया।
“आपको मेरे हाथों की चिंता है?”
वह मुस्कुराई।
“बिल्कुल।”
आरव ने उसका हाथ पकड़ लिया।
“तो आराम कीजिए।”
“मैं आराम ही कर रही हूँ।”
“आप मुझे दबा रही हैं।”
“तो?”
वह मुस्कुराया।
“तो कुछ नहीं।”
—
एक दोपहर आरव लैपटॉप पर काम कर रहा था कि सरोज एक नोटबुक लेकर आई।
उसने नोटबुक उसके पास रख दी।
“ये क्या है?”
“हमारा बजट।”
आरव ने सिर उठाया।
“हमारा?”
“हाँ।”
वह उसके पास कुर्सी खींचकर बैठ गई।
“मैं चाहती हूँ आप मेरे साथ इसे प्लान करें।”
आरव ने पन्नों को देखा।
“आप मुझसे पूछ रही हैं?”
“हाँ, आरव जी।”
उसने नोटबुक खोल दी।
“घर का खर्च। निवेश। सेविंग्स। बच्चे का खर्च।”
दोनों लगभग एक घंटे तक हिसाब देखते रहे।
धीरे-धीरे आरव के चेहरे के भाव बदलने लगे।
“आपने कितना बचाया है?”
सरोज ने उसे रकम दिखाई।
आरव की उँगलियाँ कीबोर्ड पर रुक गईं।
“इतना…”
सरोज उसे देखती रही।
“काफी है?”
वह कुर्सी से पीछे टिक गया।
“आपने इतना सब बचाया है?”
“हमारे लिए।”
वह फिर उस रकम को देखने लगा।
कई सालों से पैसों की चिंता उसके मन के किसी कोने में चुपचाप बैठी हुई थी।
अब पहली बार उसे समझ आया कि सरोज हर रुपये को लेकर इतनी सावधान क्यों रहती थी।
वह सिर्फ खर्च नियंत्रित नहीं कर रही थी।
वह उनका भविष्य बना रही थी।
आरव ने लंबी साँस ली।
“मुझे बिल्कुल पता नहीं था।”
सरोज मुस्कुराई।
“आपने कभी पूछा ही नहीं।”
उसने उसकी ओर देखा।
“आपको मुझे बताना चाहिए था।”
“अब बता रही हूँ।”
उसने नोटबुक उसकी ओर सरका दी।
“अब से मेरे साथ प्लान करेंगे।”
आरव ने सिर हिलाया।
“जी।”
सरोज मुस्कुराई।
“और आपकी पॉकेट मनी दस हज़ार होनी चाहिए।”
उसने सिर उठाया।
“क्या?”
“आप साल में पचास लाख कमाते हैं।”
उसने नोटबुक में रकम लिख दी।
“दस हज़ार तो बनते हैं।”
आरव ने सिर हिला दिया।
“नहीं, मैं ठीक हूँ।”
“आरव जी।”
“सच में। अब घर में ज़रूरतें ज़्यादा होंगी। आप बेहतर प्लान करती हैं।”
सरोज कुछ क्षण उसे देखती रही।
फिर उसने बिना कुछ कहे वही रकम नोटबुक में लिख दी।
—
कुछ हफ्तों बाद आरव जूते पहन रहा था।
सरोज दरवाज़े के पास खड़ी थी।
“कहाँ जा रहे हैं?”
“रोहन के घर।”
उसने सिर हिलाया।
“ठीक है।”
आरव रुक गया।
उसने उसकी ओर देखा।
“ठीक है?”
“हाँ।”
“आप मुझे जाने दे रही हैं?”
सरोज मुस्कुराई।
“क्यों नहीं जाने दूँगी?”
आरव उसे देखता रहा।
फिर हल्के से हँसा।
“आपको क्या हो गया है?”
सरोज ने पल भर के लिए नज़रें झुका लीं।
“मैं सोच रही थी।”
“क्या?”
वह उसके पास आई।
“पहले मैं अपने पति पर बहुत हुक्म चलाती थी।”
आरव मुस्कुराया।
“चलाती थीं।”
सरोज ने उसे देखा।
वह तुरंत थोड़ा नरम पड़ गया।
“जी।”
सरोज ने अपने गले के मंगलसूत्र को छुआ।
“लेकिन अब मैं अपने बच्चे के पिता के साथ ऐसा नहीं कर सकती।”
आरव की मुस्कान धीरे-धीरे गायब हो गई।
सरोज ने धीमे स्वर में कहा,
“शायद मैं डरती थी।”
“किससे?”
उसने उसकी आँखों में देखा।
“आपसे।”
आरव सचमुच चौंक गया।
“मुझसे?”
“आप मुझसे बहुत अलग थे।”
वह हल्का-सा हँसी।
“आप इतने हैंडसम थे। इतने पढ़े-लिखे। इतने बुद्धिमान। हर कोई आपकी तारीफ़ करता था।”
“और आपको लगता था?”
“कि एक दिन आपको लगेगा कि आप इससे बेहतर शादी कर सकते थे।”
आरव एक कदम उसके पास आया।
“सरोज जी…”
उसने सिर हिला दिया।
“नहीं।”
उसकी आँखें नम थीं, मगर चेहरे पर मुस्कान थी।
“मुझे पता है यह बेवकूफ़ी लगती है।”
आरव ने उसका हाथ पकड़ लिया।
वह आगे बोली,
“मैं बहुत पढ़ी-लिखी नहीं थी। मैंने कभी खुद को बहुत खूबसूरत नहीं समझा। और फिर मेरी शादी एक ऐसे AI जीनियस से हो गई जो इतनी बड़ी कंपनी चलाता था।”
आरव ने उसकी उँगलियाँ दबाईं।
“तो आपने मुझे डराकर अपने पास रखने का फैसला किया?”
सरोज भावुक होकर हँस पड़ी।
“कुछ ऐसा ही।”
वह भी मुस्कुराया।
सरोज ने अपना दूसरा हाथ उसके हाथ पर रख दिया।
“लेकिन अब…”
उसकी नज़र अपने पेट पर चली गई।
“अब मैं सिर्फ आपकी पत्नी नहीं हूँ।”
आरव ने भी उसकी नज़र का पीछा किया।
“मैं आपके बच्चे की माँ हूँ।”
उसने फिर आरव की ओर देखा।
“और पता नहीं क्यों, इससे मेरा डर खत्म हो गया।”
आरव कुछ नहीं बोला।
सरोज मुस्कुराई।
“अब जाइए।”
उसने दरवाज़े की ओर देखा।
फिर उसकी ओर।
“सच?”
“हाँ।”
“मज़े करूँ?”
“हाँ।”
“देर से आऊँ?”
सरोज की भौंह उठी।
“अपनी किस्मत मत आज़माइए।”
आरव हँस पड़ा।
“ये हुई न बात।”
सरोज मुस्कुराई।
“जाइए, आरव जी।”
वह झुका और उसके माथे पर चूमा।
“थैंक यू।”
सरोज उसे जाते हुए देखती रही।
और पहली बार, जब दरवाज़ा उसके पीछे बंद हुआ, तो उसे ऐसा नहीं लगा कि उसने अपने हाथ से कुछ निकल जाने दिया है।
उसे इतना भरोसा था कि वह उसे जाने दे सकती थी—
और वह अपने आप वापस आ जाएगा।
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