दुःस्वप्न



“प्लीज़ सर… मैंने कुछ नहीं किया।”

अविनाश की आवाज़ काँप रही थी।

राजन मुस्कुराया। वह पूरी कक्षा का सबसे दबंग लड़का था। हर कोई उसके बारे में जानता था, हर किसी ने उसे दूसरों को परेशान करते देखा था, लेकिन उसके खिलाफ बोलने की हिम्मत किसी में नहीं थी।

अविनाश ने यही गलती की थी।

उसने परीक्षा में राजन और उसके दोस्तों को नकल करते हुए पकड़ लिया था और उनकी शिकायत कर दी थी। राजन ने तय कर लिया था कि अविनाश को इसकी सज़ा मिलेगी।

एक तमाचा।

अविनाश का चेहरा एक तरफ घूम गया।

“एक और,” राजन ने कहा।

दूसरा तमाचा।

अविनाश ने नज़रें झुका लीं।

“मैं तुमसे बात कर रहा हूँ, मेरी तरफ देखो।”

अविनाश ने धीरे से आँखें उठाईं।

राजन ने पहले से भी ज़ोर से थप्पड़ मारा।

इस बार अविनाश की आँख से एक आँसू निकल आया।

राजन मुस्कुराया।

“एक आँसू?”

उसने हाथ उठाया।

“इसका मतलब दस और।”

अविनाश का दिल तेज़ी से धड़कने लगा।

“प्लीज़…”

लेकिन राजन ने उसकी मेज़ पर रखी प्रोजेक्ट फाइल उठा ली थी।

उस प्रोजेक्ट को पूरा करने में अविनाश ने कई सप्ताह लगाए थे। हर पन्ना करीने से लिखा था, हर चित्र बड़ी मेहनत से बनाया गया था। उसे उस प्रोजेक्ट पर बहुत गर्व था।

राजन ने पहला पन्ना फाड़ दिया।

चर्रर्र।

“नहीं!”

दूसरा पन्ना।

चर्रर्र।

“रुको!”

एक और।

“नहीं!”

उसकी चीख अँधेरे कमरे में गूँज उठी।

अविनाश की आँख खुल गई।

वह बिस्तर पर उठकर बैठ गया और तेज़-तेज़ साँस लेने लगा। कुछ क्षण तक उसे समझ ही नहीं आया कि वह कहाँ है।

कमरा अँधेरा था।

चारों ओर सन्नाटा था।

फिर बगल से नींद में डूबी आवाज़ आई—

“अवि?”

श्रेया जाग चुकी थी।

“तुम ठीक हो?”

अविनाश ने कोई जवाब नहीं दिया।

वह सामने देख रहा था, लेकिन वास्तव में अपने कमरे को नहीं देख रहा था।

कुछ देर के लिए वह फिर वहीं पहुँच गया था—

स्कूल में।

उस कक्षा में।

राजन के सामने।

पंद्रह साल की उम्र में।

श्रेया ने बेडसाइड लैंप जला दिया।

“फिर वही सपना?”

अविनाश ने उसकी ओर देखा।

उसे जवाब देने की ज़रूरत नहीं थी।

श्रेया सब समझ चुकी थी।

वह उसके पास आई और उसे अपनी बाँहों में भर लिया।

“मेरे बच्चे…”

उसने उसे कसकर पकड़ लिया।

रात के दो बज रहे थे, लेकिन श्रेया जानती थी कि अब अविनाश दोबारा नहीं सो पाएगा। वह चुपचाप बिस्तर से उठी और रसोई की ओर चली गई।

“मैं तुम्हारे लिए कुछ बनाती हूँ।”

अविनाश बिस्तर पर बैठा रहा।

पच्चीस साल।

पच्चीस साल बीत चुके थे।

अब वह वह डरा हुआ बच्चा नहीं था।

वह डॉ. अविनाश यादव था—शहर के सबसे सम्मानित हृदय रोग विशेषज्ञों में से एक।

एक आलीशान डुप्लेक्स में अपने परिवार के साथ रहता था।

उसकी पत्नी उसे बेहद प्यार करती थी।

दो खूबसूरत बच्चे थे।

ऐसी ज़िंदगी, जिसकी कल्पना वह पंद्रह साल का डरा हुआ लड़का कभी नहीं कर सकता था।

फिर भी एक दुःस्वप्न उसे कुछ ही सेकंड में वापस उसी अतीत में पहुँचा देता था।

वह उससे बाहर क्यों नहीं निकल पा रहा था?

शायद इसलिए कि वह सिर्फ एक घटना नहीं थी।

बहुत सारी घटनाएँ थीं।

बहुत सारे दिन।

बहुत सारे चेहरे।

बहुत सारी बेइज़्ज़तियाँ।

बहुत से ऐसे पल, जब उसने चाहा था कि वह कहीं गायब हो जाए।

और एक बात ऐसी थी जो उसने आज तक किसी को नहीं बताई थी।

यहाँ तक कि श्रेया को भी नहीं।

श्रेया जानती थी कि उसके अतीत में कुछ बहुत बुरा हुआ था। उसने उसके व्यवहार में उसके निशान देखे थे—जब आसपास स्कूल के बच्चे हँसते तो अविनाश अचानक चुप हो जाता। किसी के रूप-रंग का मज़ाक उड़ाया जाता तो वह असहज हो जाता। वह कभी-कभी रात में डरकर उठ जाता। कई बार श्रेया ने उसे देर रात अकेले बैठे हुए भी देखा था, जैसे वह ऐसी यादों में खोया हो जिनके बारे में वह बात नहीं करना चाहता था।

लेकिन उसने कभी उससे सवाल नहीं किया।

इसलिए नहीं कि उसे जानने की इच्छा नहीं थी।

बल्कि इसलिए कि वह अविनाश का सम्मान करती थी।

वह समझती थी कि कुछ घाव ऐसे होते हैं जिन्हें इंसान तब तक खोलना नहीं चाहता, जब तक वह खुद तैयार न हो।

इसलिए उसने बहुत पहले एक निर्णय ले लिया था—

अगर अविनाश अपने अतीत के बारे में बात नहीं करना चाहता, तो वह उसे कभी मजबूर नहीं करेगी।

इसके बजाय वह उसके वर्तमान को इतना प्यार से भर देगी कि शायद एक दिन उसका अतीत उतना दर्द न दे।

वह उससे पूरे दिल से प्यार करती थी।

किसी ऐसे व्यक्ति की तरह नहीं जिसे “ठीक” करने की ज़रूरत हो।

बल्कि उस इंसान की तरह जिसे उसने अपना जीवनसाथी चुना था।

अपने पति को।

अपने साथी को।

अपने अवि को।

और शायद इसी वजह से वह धीरे-धीरे ठीक होने लगा था।

लेकिन ठीक होने का अर्थ यह नहीं था कि वह सब कुछ भूल गया था।

—

अविनाश के माता-पिता ने उसे अच्छी शिक्षा देने के लिए बहुत मेहनत की थी। उनके पास खुद बहुत कम था और बेटे की पढ़ाई के लिए उन्होंने लगभग सब कुछ त्याग दिया था।

जब भी अविनाश शिकायत करता, वे उसकी मदद करने की कोशिश करते।

लेकिन स्कूल का प्रबंधन उसकी शिकायतों को गंभीरता से नहीं लेता था।

कभी फीस जमा करने की याद दिलाई जाती।

कभी देर से फीस भरने पर चेतावनी मिलती।

और हर बार उसकी समस्याएँ किसी न किसी कारण से टाल दी जातीं।

कई बार अविनाश दरवाज़े पर खड़ा होकर कहता—

“मुझे स्कूल नहीं जाना।”

उसकी माँ पूछती—

“क्यों?”

“वे मुझे परेशान करते हैं।”

उसके माता-पिता चिंतित होते।

लेकिन बेटे के लिए उनके सपने उसके बचपन के डर से बड़े थे।

और आखिरकार वे सपने जीत गए।

अविनाश डॉक्टर बन गया।

बहुत सफल डॉक्टर।

लेकिन उसके भीतर कहीं वह डरा हुआ स्कूल का बच्चा पूरी तरह कभी नहीं गया।

उसका सबसे बड़ा डर था कि उसके बच्चों को भी कभी वही सब न सहना पड़े जो उसने सहा था।

श्रेया से शादी से पहले उसने उससे कहा था—

“मुझे नहीं पता कि मैं कभी बच्चे चाहता भी हूँ या नहीं।”

श्रेया ने बिना किसी झिझक के कहा था—

“तो हमें बच्चे नहीं करने पड़ेंगे।”

न कोई बहस।

न कोई दबाव।

सिर्फ प्यार।

और धीरे-धीरे श्रेया का प्यार उसके डर से बड़ा हो गया।

आखिरकार उनके दो बच्चे हुए—पहले बेटी और फिर बेटा।

उनकी बेटी पलक अब हाई स्कूल में थी।

और यहीं से अविनाश के दुःस्वप्न फिर लौटने लगे।

पहले उसे समझ नहीं आया कि ऐसा क्यों हो रहा है।

फिर उसे एहसास हुआ।

उसकी बेटी अब उन्हीं गलियारों में चल रही थी, जिनसे कभी वह खुद डरता था।

वह उसकी स्कूल की ज़िंदगी के बारे में जरूरत से ज्यादा पूछने लगा।

पलक को यह पसंद नहीं था।

“पापा, आपको हर चीज़ के बारे में पूछने की जरूरत नहीं है।”

“मैं तो बस पूछ रहा हूँ कि स्कूल कैसा था।”

“ठीक था।”

“कोई परेशान तो नहीं करता?”

“नहीं।”

“पक्का?”

“हाँ!”

लेकिन बाद में अविनाश को एक और बात पता चली।

उसकी बेटी को कोई परेशान नहीं कर रहा था।

बल्कि वह खुद दूसरों को परेशान कर रही थी।

वह दूसरी लड़कियों के शरीर को लेकर भद्दी बातें करती थी।

उनकी त्वचा का मज़ाक उड़ाती थी।

छोटी कक्षाओं के बच्चों की रैगिंग में शामिल होती थी।

दूसरों को शर्मिंदा देखकर हँसती थी।

अविनाश यह देखकर अंदर तक हिल गया।

उसने बेटी से बात करने की कोशिश की।

लेकिन हर बातचीत झगड़े में बदल जाती।

एक शाम बहस बहुत बढ़ गई।

“दुनिया ऐसे ही चलती है, पापा!” पलक चिल्लाई।

अविनाश उसे घूरता रहा।

“ताकतवर लोग कमजोरों को दबाते हैं।”

वह कुछ पल रुकी।

फिर बिना यह समझे कि उसके शब्द कितनी गहराई से चोट करेंगे, उसने कहा—

“आप उन बेचारी लड़कियों से खुद को जोड़ सकते हैं। आप भी तो कमजोर आदमी हैं।”

कमरे में सन्नाटा छा गया।

अविनाश ने कुछ नहीं कहा।

दरवाज़े पर खड़ी श्रेया आगे बढ़ी।

एक तमाचा।

यह पहली बार था जब उसने अपनी बेटी को मारा था।

पलक के चेहरे पर सदमे के भाव आ गए।

“अपने पिता से इस तरह बात करने की तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई?”

श्रेया की आवाज़ काँप रही थी।

फिर उसका गुस्सा टूट गया।

उसकी आँखों में आँसू भर आए।

“तुम मेरी बेटी नहीं हो सकती।”

पलक उसे देखती रही।

“तुमने अपने पिता का अपमान किया। मैंने कहाँ गलती की?”

उसकी आवाज़ टूट गई।

“शायद गलती मेरी ही है। शायद मैं बुरी माँ हूँ। शायद मैं बुरी पत्नी भी हूँ।”

“श्रेया…”

“नहीं, अवि।”

उसने आँसू पोंछे।

“क्या तुम्हें पता भी है कि तुम्हारे पिता कौन हैं?”

पलक ने अविनाश की ओर देखा।

“तुम्हारे पिता बहुत कम साधनों में बड़े हुए। उनके माता-पिता ने उन्हें वह जीवन देने के लिए संघर्ष किया जो उन्हें खुद कभी नहीं मिला।”

उसने घर की ओर इशारा किया।

“और तुम्हें जो अवसर मिले, तुमने उनका क्या किया?”

उसकी आवाज़ फिर टूट गई।

“तुमने उन अवसरों का इस्तेमाल किसी और को छोटा महसूस कराने के लिए किया।”

पलक ने नज़रें झुका लीं।

श्रेया अपने पति की ओर मुड़ी।

“माफ़ करना, अवि। मैं उसे अच्छे संस्कार नहीं दे पाई।”

अविनाश आखिरकार उठ खड़ा हुआ।

“श्रेया, पागल मत बनो।”

वह आँसुओं के बीच उसे देखती रही।

“तुम दुनिया के सबसे अच्छे पति हो,” उसने धीरे से कहा। “और शायद किसी बच्चे को मिलने वाली सबसे अच्छी माँ भी।”

अविनाश ने गहरी साँस ली।

“लेकिन शायद एक गलती मैंने भी की।”

सबकी नज़र उसकी ओर उठी।

“मैंने इतना डरते हुए समय बिताया कि कहीं मेरे बच्चों को कोई परेशान न करे, कि मैं उन्हें यह सिखाना भूल गया कि किसी को परेशान करने से कितना दर्द होता है।”

उसने पलक की ओर देखा।

“मैंने तुम्हें कभी नहीं बताया कि बुली करना क्यों इतना गलत है।”

पलक का चेहरा बदल गया।

“मैंने अपनी स्कूल की ज़िंदगी तुमसे छिपाई। मुझे लगा कि अगर मैंने तुम्हें अपने अतीत के बारे में नहीं बताया, तो मेरा अतीत तुम्हारा बोझ नहीं बनेगा।”

वह कुछ पल रुका।

“लेकिन शायद मुझे तुम्हें बताना चाहिए था।”

श्रेया ने तुरंत सिर हिलाया।

“नहीं, बच्चे। तुम्हें ऐसा करने की जरूरत नहीं है।”

अविनाश ने उसकी ओर देखा।

उसकी आँखों में अब डर नहीं था।

फैसला था।

“हाँ।”

उसने श्रेया का हाथ पकड़ लिया।

“मुझे बताना चाहिए।”

—

अविनाश बैठ गया।

उसके बच्चे उसके सामने बैठ गए।

उसके माता-पिता पास ही थे।

श्रेया ने उसका हाथ थाम रखा था।

अविनाश ने गहरी साँस ली।

“जब मैं स्कूल में था, तब मुझे सिर्फ इसलिए परेशान नहीं किया गया था कि मैंने नकल की शिकायत की थी।”

उसने गला साफ किया।

“वह तो बस कहानी का एक हिस्सा था।”

पलक चुपचाप सुन रही थी।

“मैं दिखने में थोड़ा अलग था।”

उसने हल्की, शर्मीली मुस्कान दी।

“मेरे चेहरे की बनावट कुछ ऐसी थी जिसे लोग लड़कियों जैसी कहते थे। चेहरा थोड़ा नरम था, आवाज़ भी। मैं उन लड़कों जैसा नहीं दिखता था जो खुद को बहुत ‘मर्द’ समझते थे।”

उसने बेटे की ओर देखा।

“और उनके लिए इतना ही काफी था।”

उसकी आवाज़ धीमी हो गई।

“वे मेरे रूप का मज़ाक उड़ाते थे।”

वे उसे अलग-अलग नामों से पुकारते।

जब वह उनके पास से गुजरता तो हँसते।

कभी उसकी चाल-ढाल की नकल करते।

कभी सिर्फ इसलिए उसे घेर लेते कि उसकी परेशानी देखकर उन्हें मज़ा आए।

और कभी बात इससे भी आगे बढ़ जाती।

“एक दिन,” अविनाश ने कहा, “कुछ बड़े लड़कों ने मुझे पकड़ लिया।”

श्रेया की उँगलियाँ उसके हाथ पर और कस गईं।

उसने यह हिस्सा पहले कभी नहीं सुना था।

“उन्होंने सोचा कि मुझे औरतों के कपड़े पहनाना बहुत मज़ेदार होगा।”

पलक का चेहरा बदल गया।

“उन्होंने मेरे चेहरे पर मेकअप लगाया।”

उसकी आवाज़ लगभग गायब हो गई।

“फिर उन्होंने मुझे नचाया… और खुद हँसते रहे।”

कमरे में सन्नाटा था।

“मुझे याद है कि मैं सबको हँसते हुए देख रहा था।”

वह रुका।

“मुझे लगा था कि शायद अगर मैं शर्मिंदा होना बंद कर दूँ, तो यह सब खत्म हो जाएगा।”

उसकी आँखों में आँसू आ गए।

“लेकिन ऐसा नहीं हुआ।”

उसने आँखें पोंछीं।

“और भी बहुत कुछ हुआ।”

उसके पिता ने सिर झुका लिया।

“एक बार उन्होंने मुझसे ज़मीन की धूल तक चटवाई।”

पलक ने अपना मुँह ढक लिया।

श्रेया की आँखें तुरंत भर आईं।

फिर भी अविनाश बोलता रहा।

“वे यह साबित करना चाहते थे कि वे मुझसे कुछ भी करवा सकते हैं।”

उसने अपने बच्चों की ओर देखा।

“और मैंने उन्हें करने दिया।”

“नहीं,” श्रेया ने फुसफुसाकर कहा।

अविनाश ने उसकी ओर देखा।

“उन्होंने तुम्हें मजबूर किया था।”

वह चुप रहा।

श्रेया ने उसका हाथ दबाया।

“तुम सिर्फ एक बच्चे थे।”

अविनाश ने धीरे से सिर हिलाया।

“हाँ।”

उस एक शब्द में पच्चीस साल का दर्द समाया हुआ था।

—

अविनाश ने आगे बताया कि कई बार वह घर लौटता था और उसके माता-पिता पूछते थे कि क्या हुआ।

उसकी माँ रोने लगी।

“मैंने कुछ नहीं बताया,” उसने कहा।

उसकी माँ ने अपना चेहरा ढक लिया।

“मैंने बस कहा कि कुछ लड़कों ने मुझे परेशान किया था।”

उसके पिता की आवाज़ काँप गई।

“तुमने हमें क्यों नहीं बताया?”

अविनाश ने उनकी ओर देखा।

“क्योंकि मुझे शर्म आती थी।”

उसके पिता का चेहरा टूट गया।

“मुझे लगता था कि आप लोग मुझसे निराश हो जाएँगे।”

“हम तुमसे कभी निराश नहीं हो सकते थे।”

“अब मुझे पता है।”

अविनाश हल्का-सा मुस्कुराया।

“लेकिन तब मुझे यह नहीं पता था।”

कमरे में कोई नहीं बोला।

चारों ओर धीमी सिसकियाँ थीं।

यहाँ तक कि उसका छोटा बेटा भी इतना समझ गया था कि उसके पिता को बहुत गहरी चोट पहुँची थी।

श्रेया हमेशा जानती थी कि अविनाश के भीतर कोई पुराना दर्द था।

लेकिन उसकी पूरी कहानी आज पहली बार उसके सामने थी।

अब उसे समझ आ रहा था कि बच्चों के मज़ाक उड़ाने पर अविनाश इतना परेशान क्यों हो जाता था।

किसी के रूप-रंग पर हँसी सुनकर वह अचानक चुप क्यों हो जाता था।

स्कूल से जुड़े दुःस्वप्न आज भी उसकी ज़िंदगी में क्यों लौट आते थे।

वर्षों से श्रेया उस दर्द को ठीक करने की कोशिश करती रही थी जिसका नाम तक वह नहीं जानती थी।

आज उसे उसका नाम पता चल गया था।

लेकिन उसे इस बात का अफसोस नहीं था कि उसने बिना पूरी कहानी जाने भी अविनाश से प्यार किया।

बल्कि वह इसके लिए आभारी थी।

—

जब अविनाश ने अपनी बात पूरी की, वह बेहद थका हुआ लग रहा था।

श्रेया उसके लिए पानी लाई।

पलक अब तक बिल्कुल चुप बैठी थी।

फिर वह उठी।

वह अपने पिता के पास गई और उनके बगल में ज़मीन पर बैठ गई।

और रोने लगी।

“पापा…”

अविनाश ने उसकी ओर देखा।

“मुझे माफ़ कर दीजिए।”

उसकी आवाज़ रोते-रोते टूट गई।

“मुझे बहुत अफसोस है।”

अविनाश झुक गया।

पलक ने उसके पैर पकड़ लिए।

“मैंने आपको कमजोर कहा।”

वह ठीक से बोल भी नहीं पा रही थी।

“मुझे पता नहीं था।”

अविनाश ने धीरे से उसके सिर पर हाथ रखा।

“तुम्हें पता नहीं था।”

“लेकिन मुझे पता होना चाहिए था।”

“हाँ।”

पलक और जोर से रोने लगी।

“मैं फिर कभी ऐसा नहीं करूँगी।”

“मुझसे वादा करो।”

“वादा।”

“किसी के शरीर का मज़ाक नहीं उड़ाओगी।”

“वादा।”

“किसी की त्वचा या रंग को लेकर उसे शर्मिंदा नहीं करोगी।”

“वादा।”

“किसी की रैगिंग नहीं।”

“वादा।”

“और सिर्फ इसलिए किसी को परेशान नहीं करोगी कि तुम्हें लगता है कि तुम उससे ज्यादा ताकतवर हो।”

पलक ने सिर हिलाया।

“वादा।”

अविनाश ने उसे अपनी बाँहों में भर लिया।

श्रेया उन्हें देखती रही।

उसकी आँखों में फिर आँसू आ गए।

लेकिन इस बार ये आँसू अलग थे।

दर्द के भी थे।

और उम्मीद के भी।

श्रेया ने पलक की ओर देखा।

“तुमने अपने पिता को कमजोर कहा था।”

पलक ने सिर उठाया।

“यही उनकी ताकत है।”

उसने धीरे से अविनाश की ओर इशारा किया।

“उन्होंने अपने बच्चों को अपनी ज़िंदगी के सबसे दर्दनाक हिस्से के बारे में बताया है।”

वह कुछ पल रुकी।

“वे बातें जो वह अपने माता-पिता तक को नहीं बता पाए थे।”

अविनाश के माता-पिता उसकी ओर देखने लगे।

“वे बातें जो उन्होंने मुझे भी कभी नहीं बताईं।”

श्रेया की आवाज़ भर्रा गई।

“और मैंने इस इंसान से वर्षों तक बिना कभी यह माँगे प्यार किया कि वह मुझे अपने घावों का हिसाब दे।”

उसने अविनाश की ओर देखा।

“मुझे पता था कि तुम्हारे अंदर दर्द है, अवि।”

“मैं बस चाहती थी कि तुम्हें यह एहसास रहे कि मेरे साथ तुम सुरक्षित हो।”

अविनाश की आँखें फिर भर आईं।

श्रेया आँसुओं के बीच मुस्कुराई।

“मैंने यही कोशिश की कि तुम्हें इतना प्यार दूँ कि एक दिन तुम्हें प्यार किए जाने से डर न लगे।”

अविनाश ने उसका हाथ पकड़ लिया।

“तुमने कर दिखाया।”

श्रेया ने सिर हिलाया।

“नहीं।”

उसने उसकी उँगलियाँ दबाईं।

“हमने कर दिखाया।”

—

कुछ देर बाद उसके माता-पिता भी उसके पास आए।

उसकी माँ रोते हुए माफी माँगने लगी।

उसके पिता के लिए बोलना मुश्किल हो रहा था।

“हमें पता नहीं था।”

“मुझे पता है।”

“हमें तुम्हारी रक्षा करनी चाहिए थी।”

अविनाश ने उन्हें गले लगा लिया।

“आप लोगों ने जितना कर सकते थे, सब किया।”

उसके पिता ने सिर हिलाया।

“हमने तुम पर बहुत दबाव डाला।”

“और उसी वजह से मैं डॉक्टर बन पाया।”

अविनाश मुस्कुराया।

“अगर आपके सपने नहीं होते, तो शायद मैं आज यहाँ तक नहीं पहुँचता।”

वे सब रो पड़े।

पहली बार उसके माता-पिता ने अपने बेटे के बचपन की पूरी कहानी देखी थी।

और पहली बार अविनाश को यह दर्द अकेले नहीं उठाना पड़ रहा था।

उस रात कुछ बदल गया।

अतीत वास्तव में नहीं बदला था।

जिन लोगों ने उसे चोट पहुँचाई थी, वे अपनी हरकतें वापस नहीं ले सकते थे।

वे अपमान मिटाए नहीं जा सकते थे।

उस पंद्रह साल के डरे हुए लड़के को उसके बीते हुए साल वापस नहीं दिए जा सकते थे।

लेकिन अब वे यादें सिर्फ उसकी नहीं थीं।

उसके परिवार को सब पता था।

वे समझ गए थे।

और वे उसके साथ थे।

शायद यही वह चीज़ थी जिसकी उसे इतने वर्षों से ज़रूरत थी।

किसी ऐसे व्यक्ति की नहीं जो उसे कहे कि सब भूल जाओ।

न ही ऐसे व्यक्ति की जो कहे कि और मजबूत बनो।

बल्कि किसी ऐसे व्यक्ति की, जो उसके पास बैठकर उसके साथ उन यादों को सह सके।

जो उससे कहे—

“तुम सिर्फ एक बच्चे थे।”

“इसमें तुम्हारी गलती नहीं थी।”

“अब तुम सुरक्षित हो।”

—

अगली सुबह सूरज की रोशनी पर्दों से छनकर कमरे में आ रही थी।

अविनाश ने धीरे से आँखें खोलीं।

श्रेया उसके पास बैठी उसे देख रही थी।

वह मुस्कुराया।

“सोते हुए तुम बहुत अच्छी लगती हो।”

अविनाश हल्का-सा हँसा।

“मुझे क्यों लग रहा है कि तुम रात में ठीक से सोई ही नहीं?”

वह मुस्कुराई।

“लेकिन यह इसके लायक था।”

“क्या?”

“तुम्हें पूरी रात शांति से सोते हुए देखना।”

अविनाश कुछ देर चुप रहा।

उसने खिड़की की ओर देखा।

“मुझे डर था कि आज रात फिर दुःस्वप्न आएगा।”

श्रेया ने उसका हाथ थाम लिया।

“तो क्या हुआ, अवि?”

उसने उसकी ओर देखा।

“मैं यहाँ हूँ।”

उसने उसकी उँगलियाँ दबाईं।

“जहाँ हमेशा से थी।”

अविनाश मुस्कुराया।

पच्चीस वर्षों से वह अपने उस पुराने रूप से भागने की कोशिश कर रहा था।

शायद ठीक होने का मतलब उसे भूल जाना नहीं था।

शायद ठीक होने का मतलब था—

पीछे मुड़कर उस डरे हुए बच्चे की आँखों में देखना और उससे कहना:

“तुम बच गए।”

“इसमें तुम्हारी कोई गलती नहीं थी।”

और कई दशकों में पहली बार…

अविनाश को इस बात पर सचमुच विश्वास हुआ।

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