समुद्र की उस यात्रा को सात वर्ष बीत चुके थे, जब चारों चचेरे भाई-बहन एक साथ लौटे थे। सात साल—इतना समय किसी की जिंदगी बदल देने के लिए काफी होता है।
तब की तान्या अब अट्ठाईस वर्ष की हो चुकी थी। डॉ. तान्या जोशी। उसने अपनी मेडिकल पढ़ाई पूरी कर ली थी, अपना करियर बना लिया था और सबसे महत्वपूर्ण—अपनी एक स्वतंत्र पहचान बना ली थी।
और अब उसकी शादी होने वाली थी।
डॉ. वरुण गुप्ता से।
उसके प्रेमी से।
उसकी अपनी पसंद से।
ठीक वही बात जिसके लिए उसने सात साल पहले अपने परिवार के सामने लड़ाई लड़ी थी।
तान्या की माँ विभा कभी चाहती थी कि वह अपनी बेटी के लिए खुद पति चुने। लेकिन अब वही विभा राजस्थान की सबसे भव्य शादियों में से एक आयोजित कर रही थी। एक विरासत महल पूरे सात दिनों के लिए बुक किया गया था—हल्दी, मेहंदी, संगीत, कॉकटेल नाइट, शादी और फिर रिसेप्शन।
विभा ने सारी जिम्मेदारी अपने हाथ में ले रखी थी।
बावन साल की उम्र में उसने खुद को भी एक नए रूप में ढाल लिया था। सफेद बालों का छोटा बॉब कट, स्लीवलेस साड़ियाँ, डिजाइनर बिंदियाँ, धूप का चश्मा, भारी मेकअप और बाजुओं पर टैटू। उसने फेसलिफ्ट तक करवा लिया था।
वह इसे अपना “डिवा फेज़” कहती थी।
बाकी सब उसे बस विभा कहते थे।
और उसके पीछे-पीछे हमेशा की तरह सरवेश चलते थे—उसका पर्स, मेकअप का सामान, फोन और हर चीज़ के सही समय पर सही जगह होने की जिम्मेदारी उठाए हुए।
“सरवेश जी, मुझे सब कुछ परफेक्ट चाहिए।”
“बिल्कुल, डार्लिंग।”
“अगर कुछ गड़बड़ हुई तो…”
“कुछ गड़बड़ नहीं होगी।”
“और अगर हुई?”
“मैं ठीक कर दूँगा।”
“और अगर तुम नहीं कर पाए?”
“किसी ऐसे आदमी को ढूँढ लूँगा जो कर सके।”
विभा मुस्कुराई।
“अच्छा है।”
सरवेश बुदबुदाए, “मुझे पति बनने के बजाय कर्मचारी बन जाना चाहिए था।”
विभा ने मुड़कर देखा।
“क्या कहा?”
“कुछ नहीं, डार्लिंग।”
“मैंने यही सोचा था।”
महल विशाल था—बड़े आँगन, नक्काशीदार बालकनियाँ, लंबे गलियारे और खूबसूरत बगीचे। शाम तक पूरा परिवार वहाँ इकट्ठा हो चुका था।
ऋषभ और प्रेरणा अपनी छह साल की बेटी धैर्या के साथ आए। निर्जरा और हर्ष अपने तेरह वर्षीय जुड़वाँ बच्चों के साथ पहुँचे। अपेक्षा और जतिन भी साथ आए।
चारों चचेरे भाई-बहन केंद्रीय आँगन में मिले।
कुछ क्षण तक वे बस एक-दूसरे को देखते रहे।
सात साल।
फिर ऋषभ मुस्कुराया।
“हम बूढ़े हो रहे हैं।”
“अपने बारे में बोलो,” अपेक्षा हँसी।
निर्जरा ने उसके बालों की ओर देखा।
“तुम्हारे बाल सफेद हो रहे हैं।”
“तुम्हारे भी।”
“मेरे बाल अनुभव हैं।”
“मेरे अनुभव हैं।”
जतिन ने कहा, “मेरे तो खानदानी हैं।”
सब हँस पड़े।
पहली शाम पुरानी यादों, हँसी और बातचीत में बीत गई। लेकिन हर परिवार अपने भीतर कुछ न कुछ लेकर आया था।
ऋषभ अब पिता था। निर्जरा के बच्चे किशोर हो चुके थे। अपेक्षा और जतिन के बेटे कॉलेज जा चुके थे। और विभा तथा सरवेश अपनी बेटी को घर से विदा करने वाले थे।
किसी को पता नहीं था कि यह सप्ताह उनके बारे में कितना कुछ सामने लाने वाला है।
हल्दी
अगली सुबह हल्दी थी और महल ने अपनी सारी शालीनता खो दी।
बच्चों ने शुरुआत की। निर्जरा की बेटी ने हल्दी का कटोरा चुरा लिया। उसके भाई ने दूसरा। निर्जरा उनके पीछे भागी और हर्ष ने भी उनका पीछा किया। लड़के ने पलटकर हर्ष के चेहरे पर पूरी हल्दी फेंक दी।
सब हँस पड़े।
हर्ष ने निर्जरा की ओर देखा।
“तुम्हें मज़ाक लग रहा है?”
“थोड़ा।”
“तुम्हें मेरी मदद करनी चाहिए।”
“मैं भावनात्मक रूप से तुम्हारे साथ हूँ।”
“तुम बेकार हो।”
उधर धैर्या अपने पिता ऋषभ के पीछे पड़ी थी।
“पापा!”
“नहीं।”
“पापा!”
“नहीं।”
“बस एक बार!”
“नहीं।”
आखिर धैर्या ने उनके गाल पर हल्दी लगा ही दी।
ऋषभ ने आँखें बंद कीं।
“ठीक है। अब भागो।”
वह हँसते हुए भागी। ऋषभ ने उसे पकड़ लिया। धैर्या छूटने की कोशिश कर रही थी।
“पापा, छोड़ो!”
और उसी क्षण ऋषभ का धैर्य टूट गया।
उसने उसे थप्पड़ मार दिया।
पूरा आँगन शांत हो गया।
धैर्या उसे देखती रह गई। ऋषभ को उसी क्षण अपनी गलती का एहसास हो गया।
“धैर्या…”
वह रोने लगी। प्रेरणा दौड़कर उसके पास पहुँची।
ऋषभ वहीं खड़ा रह गया।
उसे पहले भी गुस्सा आया था। लेकिन इस तरह कभी नहीं।
बाद में वह अकेला बैठा था। प्रेरणा उसके पास आकर बैठ गई।
“मुझे माफ कर दो।”
“मुझे पता है।”
“मुझे समझ नहीं आया कि मैंने ऐसा क्यों किया।”
“तुम गुस्से में थे।”
“लेकिन मुझे ऐसा नहीं करना चाहिए था।”
वह कुछ देर चुप रहा।
“मुझे लगता है मेरे साथ कुछ गलत हो रहा है। मैं कई हफ्तों से बहुत गुस्से में हूँ। हर छोटी बात परेशान करती है।”
“तुम बहुत दबाव में हो।”
“ये बहाना नहीं है।”
फिर उसने धैर्या की ओर देखा।
“मुझे मदद चाहिए।”
प्रेरणा ने उसका हाथ पकड़ लिया।
“मैं तुम्हें मदद ढूँढने में साथ दूँगी।”
ऋषभ ने सिर हिला दिया।
मेहंदी
तीसरे दिन मेहंदी थी। सब कुछ लगभग शांत था—तभी एक रोती हुई महिला वहाँ पहुँची।
“मुझे वरुण से बात करनी है।”
तान्या ठिठक गई।
विभा तुरंत आगे आई।
“आप कौन हैं?”
महिला ने वरुण की ओर देखा।
“मैं उसकी गर्लफ्रेंड हूँ।”
सन्नाटा छा गया।
वरुण हैरान था।
“क्या?”
“मुझे लगा तुम्हारी शादी अगले महीने है।”
तान्या ने वरुण की ओर देखा।
“वरुण?”
“मैं इसे जानता तक नहीं।”
महिला ने एक शादी का निमंत्रण निकाला।
सब उसके चारों ओर जमा हो गए। फिर किसी ने तारीख देखी।
शादी अगले महीने थी।
महल में दो अलग-अलग शादियाँ बुक थीं।
महिला गलती से गलत शादी में पहुँच गई थी।
कुछ क्षण की चुप्पी के बाद पूरा परिवार हँस पड़ा।
विभा नहीं हँसी।
उसने सरवेश की ओर देखा।
“सरवेश जी।”
“जी?”
“हर शादी के मेहमान को दो बार जाँचिए।”
“जी।”
“खासकर महिलाओं को।”
सरवेश ने गंभीरता से पूछा, “क्यों?”
“कुछ कहा नहीं जा सकता।”
सरवेश ने सिर हिलाया।
“जी, डार्लिंग।”
संगीत
चौथे दिन संगीत था।
ऋषभ अब भी धैर्या से दूरी बनाए हुए था। प्रेरणा ने यह देखा। उसने बेटी से कुछ कहा।
धैर्या अपने पिता के पास गई।
“पापा।”
ऋषभ ने उसकी ओर देखा।
“हाँ?”
“मम्मा ने कहा है कि मैं आपके साथ डांस कर सकती हूँ।”
ऋषभ मुस्कुराया।
“तुम करना चाहती हो?”
उसने सिर हिलाया।
ऋषभ घुटनों के बल बैठ गया।
“मुझे माफ कर दो। मुझे तुम्हें नहीं मारना चाहिए था।”
धैर्या ने कहा, “आप गुस्से में थे।”
“गुस्सा होना सही नहीं बना देता।”
धैर्या ने उसे गले लगा लिया।
संगीत शुरू हुआ और पिता-पुत्री साथ नाचने लगे। प्रेरणा दूर खड़ी उन्हें देखती रही और उसकी आँखें नम हो गईं।
फिर बाकी जोड़ों की बारी आई।
निर्जरा और हर्ष ने शानदार नृत्य किया। अपेक्षा और जतिन बिना ठीक से अभ्यास किए मंच पर पहुँचे—लेकिन उन्हें अभ्यास की जरूरत ही नहीं थी।
वे सहज थे। एक-दूसरे को छेड़ते रहे, हँसते रहे और अंत में जतिन ने अपेक्षा को चूम लिया।
पूरा हॉल तालियों से गूँज उठा।
कॉकटेल नाइट
पाँचवें दिन कॉकटेल नाइट थी।
विभा ने पहली बार शराब पी।
एक गिलास।
फिर दूसरा।
फिर तीसरा।
सरवेश चिंतित होकर देखते रहे।
“विभा…”
“सरवेश जी।”
“जी?”
“मैं बहुत खुश हूँ।”
“अच्छी बात है।”
“बहुत खुश।”
“बहुत अच्छी बात है।”
“मेरे साथ डांस कीजिए।”
“मैं डांस नहीं करता।”
“आज करेंगे।”
वह उन्हें खींचकर डांस फ्लोर पर ले गई।
विभा खुलकर नाची। सरवेश किसी तरह उसके साथ कदम मिलाने की कोशिश करते रहे। पूरा परिवार तालियाँ बजा रहा था।
फिर विभा ने उनका चेहरा पकड़कर उन्हें चूम लिया।
लंबे समय तक।
पूरा परिवार चीख पड़ा।
सरवेश स्तब्ध खड़े रहे।
विभा मुस्कुराई—और फिर उनकी बाँहों में बेहोश होकर गिर गई।
सरवेश ने उसे संभाला और बाद में कमरे तक उठाकर ले गए।
बिस्तर पर रखते समय वह थककर पसीने से भीग चुके थे।
विभा ने एक आँख खोली।
“सरवेश जी।”
“क्या?”
“आपने मुझे उठाया।”
“हाँ।”
“अच्छे पति हैं।”
वह फिर सो गई।
सरवेश ने माथे का पसीना पोंछा।
“अच्छी पत्नी।”
विभा ने नहीं सुना।
उसी रात ऋषभ ने प्रेरणा से कहा—
“मुझे थेरेपी चाहिए।”
प्रेरणा मुस्कुराई।
“मुझे पता है।”
शादी
छठे दिन तान्या की शादी थी।
महल रातोंरात बदल गया था। तान्या दुल्हन बनी खड़ी थी। वरुण इंतजार कर रहा था। परिवार चारों ओर था।
विभा की आँखों में आँसू थे।
सरवेश उसके पास खड़े थे।
उनकी बेटी जा रही थी।
लेकिन किसी के द्वारा उसे उनसे छीना नहीं जा रहा था।
वह अपनी इच्छा से एक नया जीवन चुन रही थी।
रात को जूता-छुपाई में बच्चों ने पैसे माँगे। जतिन ने मोलभाव करने की कोशिश की, लेकिन अंततः उसने आसानी से पैसे दे दिए।
अपेक्षा ने उसे घूरकर कहा, “तुम बहुत खराब मोलभाव करते हो।”
“मुझे बस जूते वापस चाहिए थे।”
ऋषभ और प्रेरणा उन्हें देखते रहे। उन्हें अपनी शादी याद आई—वह घबराहट, उत्साह और वादे। अब उनके पास एक बेटी थी और जीवन बदल चुका था। फिर भी वे साथ खड़े थे।
दूसरी ओर विभा और सरवेश चुपचाप बैठे तान्या को देख रहे थे।
विभा ने उसका हाथ पकड़ा।
“सरवेश जी।”
“हूँ?”
“हमारी बेटी जा रही है।”
“हमसे नहीं।”
“मुझे पता है।”
“लेकिन?”
“मुझे उसकी याद आएगी।”
सरवेश ने उसका हाथ दबाया।
“मुझे भी।”
रिसेप्शन
सातवें दिन रिसेप्शन था।
सबसे पहले विभा ने बोलना शुरू किया।
“मैं सरवेश जी को धन्यवाद देना चाहती हूँ। तीस साल से वह मेरे साथ खड़े हैं।”
वह कुछ क्षण रुकी।
“मेरे पिता ने हमारा परिवार छोड़ दिया था। मैं इसी डर के साथ बड़ी हुई कि लोग चले जाते हैं।”
उसने सरवेश की ओर देखा।
“जब एक बार सरवेश जी ने भी मुझे छोड़ने की बात कही थी, तो मेरा डर और बढ़ गया। मैं और सख्त होती गई, क्योंकि मुझे डर था।”
उसने उनका हाथ पकड़ लिया।
“लेकिन अब मैं जानती हूँ कि वह नहीं जाएँगे।”
वह मुस्कुराई।
“हमारी शादी को तीस साल हो गए। शायद अगले तीस साल भी साथ बिताएँ।”
फिर उसने सबको चौंकाते हुए कहा—
“अगले तीस साल मैं अपने पति के पीछे चलूँगी।”
सरवेश ने तुरंत सिर हिलाया।
“मैं सहमत नहीं हूँ।”
सब हँस पड़े।
“मैंने विभा का साथ इसलिए दिया क्योंकि फैसले लेने में वह मुझसे बेहतर है। अगर मैं उसकी सलाह न मानता तो शायद आज मैं वह आदमी नहीं होता जो हूँ। हमने सब कुछ साथ बनाया है।”
फिर वह मुस्कुराए।
“और अगर अगले तीस साल भी विभा ही नेतृत्व करेंगी, तो शायद एक दिन मैं फोर्ब्स की सूची में अरबपति बनकर दिखाई दूँ।”
विभा हँस पड़ी।
“तुम अब भी मजाक करते हो।”
“हमेशा।”
इसके बाद ऋषभ ने प्रेरणा को धन्यवाद दिया। उसने स्वीकार किया कि वह अक्सर मुश्किल पति रहा है, लेकिन प्रेरणा ने हमेशा उसका साथ दिया।
अपेक्षा और जतिन ने अपने रिश्ते की दोस्ती और प्रेम की बात की। उनके बेटे कॉलेज जा चुके थे और अब जतिन ही अपेक्षा की सारी मातृ-सुलभ देखभाल का शिकार था—वह उसके कपड़े तय करती, टिफिन बनाती और पूछती कि उसने खाना खाया या नहीं।
सब हँस पड़े।
फिर निर्जरा और हर्ष की बारी आई।
निर्जरा ने कहा कि उसने अपनी बेटी के भविष्य के लिए बहुत सख्ती की थी। वह चाहती थी कि बेटी पढ़े, करियर बनाए और किसी पर निर्भर न रहे।
लेकिन उसने एक महत्वपूर्ण बात सीखी थी—
हर बच्चे को बिना शर्त प्यार मिलना चाहिए।
उसे अपने माता-पिता का प्यार पाने के लिए वैसा बनने की जरूरत नहीं है जैसा वे चाहते हैं।
हर्ष ने फिर अपने बेटे के बारे में बात की। उसने माना कि उसने उसे बहुत सख्ती से पाला, क्योंकि वह उसे परिवार का अगला पुरुष मानता था।
“लेकिन शायद मैं भूल गया कि वह अभी भी बच्चा है।”
फिर उसने एक और बात बताई।
उसे दिल की बीमारी थी।
उसका इलाज चल रहा था और निर्जरा के अलावा किसी को पता नहीं था।
बच्चे रो पड़े। दोनों उससे लिपट गए।
“मैंने इसलिए नहीं बताया कि तुम डर में जीओ,” हर्ष ने कहा।
निर्जरा ने उसका हाथ पकड़ लिया।
उसकी आँखों में भी आँसू थे।
अंत में तान्या खड़ी हुई।
“यह शादी मेरे बारे में होनी थी,” उसने मुस्कुराकर कहा, “लेकिन मैंने इन सात दिनों में एक बात सीखी है।”
उसने अपने माता-पिता की ओर देखा।
“शादी का मतलब खुद को खो देना नहीं है।”
फिर उसने वरुण का हाथ पकड़ा।
“शादी का मतलब है—दो लोग मिलकर कुछ बनाएँ, लेकिन इस तरह नहीं कि उनमें से किसी एक का अस्तित्व मिट जाए।”
वरुण मुस्कुराया।
“मैं यही चाहती हूँ।”
अगली सुबह की शुरुआत
रिसेप्शन खत्म हो गया। मेहमान अपने कमरों में लौट गए। महल शांत हो गया।
लेकिन चारों चचेरे भाई-बहन अब भी आँगन में बैठे थे।
ऋषभ ने कहा—
“मैंने फैसला किया है। मैं थेरेपी के लिए जाऊँगा। मैं नहीं चाहता कि धैर्या मुझे ऐसे पिता के रूप में याद करे जो अपना गुस्सा नहीं संभाल पाया।”
प्रेरणा ने उसका हाथ पकड़ लिया।
“वह तुम्हें उस पिता के रूप में याद करेगी जिसने अपनी गलती पहचानी और बदलने की कोशिश की।”
जतिन ने भी अपना फैसला बताया। वह नौकरी से रिटायर होकर उस पहाड़ी शहर में जाना चाहता था जिसके बारे में वह और अपेक्षा वर्षों से बात करते आए थे।
“बगीचे वाला घर?”
“और पहाड़ों का दृश्य।”
“और मेरी किताबें?”
“और तुम्हारी चाय।”
अपेक्षा मुस्कुराई।
“चलो करते हैं।”
निर्जरा और हर्ष ने भी फैसला किया कि वे अपने बच्चों के साथ अपना व्यवहार बदलेंगे।
“अब कोई पूछताछ नहीं,” निर्जरा ने कहा।
“कोई भाषण नहीं,” हर्ष ने जोड़ा।
“अब हम दोस्त।”
उनके बच्चे मुस्कुरा दिए।
फिर विभा ने सरवेश की ओर देखा।
“मेरा भी एक फैसला है।”
सरवेश सावधान हो गए।
“क्या?”
“मैं बिजनेस शुरू कर रही हूँ।”
“कौन-सा?”
“इवेंट मैनेजमेंट।”
सरवेश ने कुछ क्षण उन्हें देखा।
“बिल्कुल।”
“तुम मेरे साथ काम करोगे?”
“जाहिर है।”
वह मुस्कुराए।
“मेरी पोस्ट क्या होगी?”
“मैनेजिंग डायरेक्टर।”
“और आपकी?”
“चेयरपर्सन।”
सरवेश हँस पड़े।
“तीस साल की शादी के बाद आखिरकार मेरा प्रमोशन हो ही गया।”
विभा ने उनका हाथ पकड़ लिया।
“तीस साल पहले मुझे ‘समझौता’ और ‘चर्चा’ के बीच का फर्क नहीं पता था।”
दोनों कुछ देर चुप बैठे रहे।
महल लगभग खाली हो चुका था।
सात दिन समाप्त हो चुके थे।
लेकिन उनकी जिंदगी में एक और अध्याय शुरू हो रहा था।
चार रिश्ते। चार फैसले। चार अलग-अलग भविष्य।
ऋषभ खुद पर काम करने वाला था।
अपेक्षा और जतिन वर्षों से टाले हुए अपने पहाड़ी जीवन की ओर जाने वाले थे।
निर्जरा और हर्ष अपने बच्चों को केवल बच्चे नहीं, बल्कि युवा वयस्क और दोस्त समझना सीखने वाले थे।
और विभा तथा सरवेश अपने तीस साल पुराने साथ से एक नया भविष्य बनाने वाले थे।
सरवेश ने विभा की ओर देखा।
“तो, डार्लिंग, बिजनेस कब शुरू होगा?”
“कल।”
“कल?”
“हाँ।”
“क्या हमें थोड़ा आराम नहीं करना चाहिए? अभी सात दिन की शादी खत्म हुई है।”
विभा ने उनकी ओर देखा।
“सरवेश जी।”
“जी?”
“हमारे पास बिजनेस बनाने का काम है।”
सरवेश ने लंबी साँस ली।
“बिल्कुल।”
विभा मुस्कुराई।
सरवेश भी मुस्कुराए।
फिर उसने अपना सिर उनके कंधे पर रख दिया।
इस बार कोई आदेश नहीं था।
कोई बहस नहीं।
कोई डर नहीं।
सिर्फ तीस साल से साथ बैठे दो लोग।
राजस्थान की रात में महल शांत खड़ा था।
सप्ताह समाप्त हो गया था।
लेकिन उनकी जिंदगी में एक नया अध्याय शुरू हो चुका था।
शायद यही उस महल की असली सीख थी—
जिंदगी कभी बदलना बंद नहीं करती।
बच्चे बड़े होते हैं।
माता-पिता उन्हें छोड़ना सीखते हैं।
पति-पत्नी एक-दूसरे के नए रूप खोजते हैं।
और जीवन के सबसे महत्वपूर्ण फैसले हमेशा शुरुआत में नहीं लिए जाते।
कभी-कभी वे तब लिए जाते हैं, जब जिंदगी का अधिकांश हिस्सा पहले ही जी लिया गया हो।
चारों चचेरे भाई-बहन ने एक-दूसरे की ओर देखा।
ऋषभ मुस्कुराया।
“तो… अगली बार कहाँ जा रहे हैं?”
अपेक्षा हँसी।
“फिर कोई छुट्टी मत प्लान करना।”
निर्जरा मुस्कुराई।
“कृपया।”
हर्ष ने सिर हिलाया।
“उन्हें करने दो।”
विभा तुरंत सरवेश की ओर मुड़ी।
“सरवेश जी, अगर ये फिर कहीं जाने का प्लान बनाएँ तो सारी व्यवस्था आप देख लेना।”
सरवेश हँस पड़े।
“लो, फिर शुरू हो गईं।”
और पूरा महल चारों चचेरे भाई-बहनों की हँसी से गूँज उठा—
वे लोग जो उम्र के साथ बड़े जरूर हुए थे, लेकिन एक-दूसरे से कभी दूर नहीं हुए।
महल में वह सप्ताह

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