हंगामा

एक ही मंज़िल पर तीन फ्लैट थे—401, 402 और 403।

फ्लैट 401 में 36 साल के योगेश शर्मा और गीतांजलि अपने छह साल के बेटे श्लोक के साथ रहते थे। दोनों घर से काम करते थे। फ्लैट 402 में 26 साल के आईटी जीनियस अरनव शर्मा और उनकी पत्नी सुमन रहते थे। सुमन घर संभालती थीं और अरनव से अक्सर काम करवाती रहती थीं।

“अरनव!”

“हाँ, सुमन जी?”

“मेरी चाय कहाँ है?”

“टेबल पर है, सुमन जी।”

“ठीक है।”

फ्लैट 403 में 46 साल के जितेंद्र और कविता अपनी 16 साल की बेटी रिया के साथ रहते थे। रिया डॉक्टर बनने की तैयारी कर रही थी और उसकी सुमन से अच्छी दोस्ती थी।

एक शाम दूसरी मंज़िल के बच्चों ने शरारत में तीनों फ्लैटों की नंबर प्लेटें आपस में बदल दीं।

उन्हें अंदाज़ा नहीं था कि इससे तीनों घरों में कैसी अफ़रा-तफ़री मचने वाली थी।

योगेश ने अपना मेलबॉक्स खोला तो उसमें एक छोटा गुलदस्ता और चिट्ठी मिली।

चिट्ठी पर लिखा था—”प्रिय गर्लफ्रेंड।”

उसमें किसी लड़की की खूबसूरत आँखों, आकर्षक शरीर और सुंदरता की तारीफ़ थी और लिखा था कि वह “उस बंदर से बेहतर” की हकदार है।

योगेश का चेहरा गुस्से से लाल हो गया।

“गीतांजलि!”

गीतांजलि ने चिट्ठी पढ़ी।

“मुझे नहीं पता ये क्या है।”

“सच?”

“मैं श्लोक की कसम खाकर कहती हूँ।”

फिर गीतांजलि ने बताया कि श्लोक के स्कूल के बाहर चाय की दुकान पर कुछ लड़के उसे देखकर टिप्पणियाँ करते थे।

योगेश तुरंत गंभीर हो गया।

“तुमने मुझे पहले क्यों नहीं बताया?”

“मुझे लगा इसे नज़रअंदाज़ करना बेहतर है। महिलाओं के लिए ये कोई असामान्य बात नहीं है।”

योगेश ने उसका हाथ पकड़ लिया।

“फिर भी तुम्हें मुझे बताना चाहिए था। मैं उन लड़कों से बात करूँगा।”

कुछ देर बाद उसने चिट्ठी दोबारा पढ़ी।

उसमें लड़की के गाल पर तिल और लंबे बालों का ज़िक्र था।

गीतांजलि के गाल पर तिल नहीं था और उसके बाल भी लंबे नहीं थे।

योगेश ने राहत की साँस ली।

“ये तुम्हारे लिए था ही नहीं।”

उधर फ्लैट 402 में सुमन ने मेलबॉक्स खोला। उसे एक स्कूल का पत्र मिला—”पिता श्री शर्मा के लिए।”

उसने पत्र खोला। वह पैरेंट-टीचर मीटिंग का निमंत्रण था।

“अरनव!”

अरनव दौड़कर आया।

“जी, सुमन जी?”

“तुम्हारा कौन-सा बेटा मॉन्टेसरी स्कूल में पढ़ता है?”

अरनव का चेहरा पीला पड़ गया।

“सुमन जी, ये गलतफहमी है।”

“मैं हमेशा से जानती थी कि तुम्हारा कोई अतीत है।”

फिर सुमन ने पुराने शक गिनाने शुरू किए।

“सब्ज़ी लेने जाते हो तो इतना परफ्यूम क्यों लगाते हो? और एक घंटे बाद क्यों लौटते हो?”

अरनव ने सिर झुका लिया।

“सुमन जी, वादा कीजिए गुस्सा नहीं करेंगी।”

“मैं पहले से गुस्से में हूँ।”

अरनव ने हिम्मत की।

“मैं रोज़ एक सिगरेट पीता हूँ।”

सुमन चुप हो गई।

“मुझे लगा आप नाराज़ होंगी।”

“तुमने मुझे बताया क्यों नहीं?”

“डरता था।”

सुमन मुस्कुराई।

“हम साथ में पी सकते थे।”

अरनव चौंका।

“आप भी?”

सुमन ने बताया कि जब वह उसे सब्ज़ी लेने भेजती थी, तब वह भी एक सिगरेट पी लेती थी। वह रूम फ्रेशनर और परफ्यूम से बदबू छिपाती थी और सिगरेट अपने मेकअप रूम में रखती थी, जहाँ अरनव कभी नहीं जाता था।

दोनों हँस पड़े।

“कब से?” अरनव ने पूछा।

“डिग्री कॉलेज से।”

अरनव ने सिर हिलाया।

“और मैं सोचता था कि आप नॉन-स्मोकर हैं।”

सुमन हँसी।

“मैं भी यही सोचती थी कि तुम नॉन-स्मोकर हो।”

तभी सुमन ने पत्र फिर देखा। रिपोर्ट कार्ड पर बच्चे का नाम था—श्लोक शर्मा।

दोनों समझ गए कि पत्र उनके लिए था ही नहीं।

उधर फ्लैट 403 में कविता को एक पार्सल मिला। खोलने पर उसमें गर्भनिरोधक सामान था।

उसने तुरंत जितेंद्र से पूछा।

“ये तुम्हारा है?”

जितेंद्र ने रिया की कसम खाकर कहा कि उसका इससे कोई लेना-देना नहीं।

फिर कविता ने रिया से पूछा।

“तुमने ऑर्डर किया?”

“नहीं!”

कविता ने उसका फोन देखा। उसमें एक नाम बार-बार था—लक्ष्य।

“ये कौन है?”

“मेरा दोस्त। हम मेडिकल एंट्रेंस की तैयारी करते हैं।”

“बॉयफ्रेंड?”

रिया कुछ पल चुप रही।

“एक स्पेशल फ्रेंड है। लेकिन हम रिलेशनशिप में नहीं हैं। मैं किसी लड़के के साथ फिजिकल नहीं हुई हूँ और अभी मेरा पूरा ध्यान पढ़ाई पर है।”

कविता ने पूछा, “तुमने हमें बताया क्यों नहीं?”

रिया की आवाज़ भर्रा गई।

“क्योंकि मुझे लगा आप मुझे जज करेंगी।”

कविता को अपनी गलती का एहसास हुआ।

“मुझे माफ कर दो।”

फिर उसने पार्सल का बिल देखा।

उस पर नाम था—

श्रीमती सुमन अरनव।

कुछ ही देर में तीनों परिवार कॉमन एरिया में मिले और पता चला कि बच्चों ने फ्लैट नंबर बदल दिए थे।

कविता ने पार्सल सुमन को दिया।

“ये आपके नाम पर है।”

सुमन ने अरनव की तरफ देखा।

“जी, सुमन जी, ये मेरा नहीं है,” अरनव ने तुरंत कहा।

सुमन मुस्कुराई।

“मुझे पता है।”

अरनव ने पैरेंट-टीचर मीटिंग वाला पत्र योगेश को दे दिया।

“योगी भाई, ये आपके लिए है।”

योगेश ने पत्र लिया और श्लोक का नाम देखकर सब समझ गया।

लेकिन उसने अपनी चिट्ठी किसी को नहीं दिखाई।

उसने रिया की तरफ देखा।

उसके गाल पर छोटा-सा तिल था और बाल लंबे थे।

अब उसे समझ आ गया था कि वह चिट्ठी रिया के लिए थी।

यह उसका बॉयफ्रेंड नहीं था, बल्कि कोई ऐसा लड़का था जो उससे एकतरफा प्यार या जलन के कारण उसे परेशान कर रहा था।

रिया उसके पड़ोस की बेटी थी। योगेश ने चिट्ठी नष्ट कर दी और गीतांजलि से भी वादा लिया कि वह इस बात का ज़िक्र किसी से नहीं करेगी।

तीन गलतफहमियों ने तीन अलग-अलग सच्चाइयाँ सामने ला दी थीं।

अगले दिन योगेश श्लोक को स्कूल छोड़ने गया और चाय की दुकान के पास उन लड़कों पर नज़र रखी।

कविता ने लक्ष्य को दोपहर के खाने पर बुलाया। दोनों ने मेडिकल एंट्रेंस की कठिन पढ़ाई और भविष्य को लेकर बात की। कविता को समझ आया कि रिया और लक्ष्य की दोस्ती जिम्मेदार और गंभीर थी।

शाम को फ्लैट 402 में सुमन ने अरनव को आवाज़ दी।

“अरनव।”

“हाँ, सुमन जी?”

“चीट टाइम।”

अरनव मुस्कुराया।

“ज़रूर, माय लव।”

दोनों बालकनी में गए और एक-एक सिगरेट जलाई।

कुछ देर बाद अरनव ने पूछा,

“सुमन जी, हमें परिवार शुरू करने के बारे में कब सोचना चाहिए?”

“अभी नहीं।”

“लेकिन…”

सुमन ने उसे देखा।

“अरनव, तुम पहले से ही 26 साल के एक बच्चे को पाल रहे हो। दूसरा बच्चा चाहिए?”

अरनव हँस पड़ा।

“नहीं, माय लव। फिलहाल एक ही काफी है।”

सुमन भी हँस पड़ी।

उस दिन के बाद सब कुछ अपनी जगह लौट आया, लेकिन तीनों परिवारों के बीच पहले जैसी दूरी नहीं रही।

तीन फ्लैट नंबरों की छोटी-सी गड़बड़ी ने उन्हें एक-दूसरे के बारे में ऐसी बातें बता दी थीं, जो शायद वर्षों की सामान्य बातचीत में कभी सामने नहीं आतीं।

और इस बार, किसी को शिकायत नहीं थी कि फ्लैट नंबर बदल गए थे।

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