सात साल बीत चुके थे, जब चारों cousins ने आखिरी बार एक पूरा सप्ताह साथ बिताया था। सात साल—इतना समय कि बच्चों का जन्म हो जाए, शादियाँ बदल जाएँ, करियर आगे बढ़ जाएँ, दोस्तियाँ गहरी हो जाएँ और इंसान बिना किसी को बताए अपने ही किसी नए रूप में बदल जाए।
रिशभ भी बदल चुका था।
ईशा से उसका रिश्ता टूट चुका था। बाद में उसे अपनी पुरानी दोस्त प्रेरणा के लिए अपने मन में उठते भावों का एहसास हुआ। प्रेरणा ने भी रिशभ को स्वीकार करने में समय लिया, लेकिन जब दोनों साथ आए तो उनका रिश्ता धीरे-धीरे बहुत गहरा और स्थिर हो गया। सात साल साथ रहने के बाद अब उन्होंने शादी करने का फैसला किया था।
प्रपोज़ल बेहद साधारण था।
एक शाम रिशभ ने प्रेरणा के पास बैठकर एक छोटी-सी अंगूठी निकाली।
“क्या तुम मुझसे शादी करोगी?”
प्रेरणा मुस्कुराई।
“हाँ।”
दोनों गले मिले।
बाद में जब वे अपने भविष्य की बातें कर रहे थे, प्रेरणा ने सहजता से कहा, “शादी के बाद हम अपना परिवार शुरू कर सकते हैं।”
रिशभ मुस्कुराया।
“बिल्कुल।”
लेकिन उसने यह नहीं बताया कि पिता बनने का विचार उसे डराता था।
उसे प्रेरणा से प्यार था। इसमें उसे कोई संदेह नहीं था। लेकिन पिता बनना उसके लिए अलग बात थी। वह जिम्मेदारी स्थायी थी। एक नया जीवन उस पर निर्भर होने वाला था। उसे डर था कि कहीं वह अच्छा पिता न बन पाए।
इसी बीच उसने परिवार के ग्रुप में संदेश भेजा—
“सात दिन। चार cousins। एक cruise. Bachelor week.”
अपेक्षा ने तुरंत पूछा, “क्या बुक किया है?”
“Cruise.”
“इससे मुझे बिल्कुल कुछ पता नहीं चला।”
“Exactly.”
निर्जरा ने लिखा, “I’m in.”
कुछ देर बाद सर्वेश का संदेश आया—“I’ll try.”
रिशभ समझ गया कि इन दो शब्दों के पीछे कौन था।
विभा।
उधर निर्जरा ने अपकेक्षा से फोन पर बात करते हुए बताया कि हर्ष को अमेरिका में एक senior position मिली है। कंपनी उसका H1B sponsor करने वाली थी। अवसर बड़ा था, लेकिन निर्जरा के मन में एक सवाल था—अगर वे अमेरिका चले गए तो उसे अपनी नौकरी छोड़नी पड़ेगी। क्या वह अपनी बनाई हुई जिंदगी छोड़ना चाहती थी?
“तुम्हें क्या लगता है?” अपकेक्षा ने पूछा।
“मैं हर्ष के लिए खुश हूँ,” निर्जरा ने कहा, “लेकिन मुझे नहीं पता कि मैं सब कुछ छोड़कर जाना चाहती हूँ या नहीं।”
अंदर ही अंदर उसे पहले से लगने लगा था कि शायद वह भारत छोड़ना ही नहीं चाहती। मगर वह अभी यह बात खुद से भी स्वीकार नहीं कर पा रही थी।
दूसरी तरफ सर्वेश की बेटी तान्या अपनी अलग लड़ाई लड़ रही थी।
वह केवल इक्कीस साल की थी और आगे पढ़ना चाहती थी। करियर बनाना चाहती थी। वह पहले अपने पैरों पर खड़ी होना चाहती थी, फिर किसी की पत्नी बनना।
लेकिन उसकी माँ विभा उसके लिए रिश्ते देख रही थीं।
एक दिन तान्या ने साफ कहा, “मैं किसी की पत्नी बनने से पहले अपनी पहचान बनाना चाहती हूँ।”
विभा ने जवाब दिया, “शादी के बाद पढ़ लेना। देखो मुझे—विभा सर्वेश जोशी। मेरा नाम ही मेरी पहचान है।”
तान्या ने शांत स्वर में पूछा, “किसकी पत्नी होने की पहचान?”
वह शादी के खिलाफ नहीं थी। वह केवल यह चाहती थी कि उसका जीवन उसका अपना निर्णय हो।
आखिर उसने एक समझौता किया।
“मैं लड़के से मिलूँगी,” उसने कहा, “लेकिन एक शर्त पर—पापा cruise पर जाएँगे।”
विभा को यह मंजूर नहीं था। फिर भी तान्या के insist करने पर उसने हामी भर दी।
तान्या के लिए यह सिर्फ एक शर्त नहीं थी। यह उम्मीद थी कि शायद उसके पिता पहली बार उसके पक्ष में खड़े होंगे।
अगली सुबह चारों cousins cruise पर सवार हो गए।
जहाज धीरे-धीरे बंदरगाह से दूर होता गया। शहर छोटा होता गया, फिर और छोटा, और आखिरकार गायब हो गया।
अब चारों ओर केवल समुद्र था।
पहला दिन बिल्कुल हल्का था।
उन्होंने swimming की, games खेले, साथ खाना खाया और dance किया। रिशभ ने dance competition में खुद को हास्यास्पद बना लिया और बाकी तीनों ने उसका खूब मजाक उड़ाया।
शाम को वे साथ बैठे तो निर्जरा ने सर्वेश को चिढ़ाना शुरू किया।
“Mr. Obedient.”
फिर वह विभा की आवाज़ की नकल करने लगी—“सर्वेश जी, मेरे लिए cold drink लाना।”
अपेक्षा हँसने लगी।
“सर्वेश जी, ठीक से बैठिए।”
रिशभ भी शामिल हो गया।
“सर्वेश जी, ऐसे क्यों बैठे हैं?”
कुछ देर बाद निर्जरा ने अचानक पीछे देखते हुए कहा, “ओह!”
सर्वेश घबरा गया।
“क्या हुआ?”
“विभा भाभी!”
सर्वेश तुरंत पीछे मुड़ा।
वहाँ कोई नहीं था।
तीनों ठहाका मारकर हँस पड़े।
सर्वेश पहले नाराज़ हुआ, फिर खुद भी हँसने लगा।
शायद कई वर्षों में पहली बार वह बिना यह सोचे हँसा था कि कोई उसकी हँसी को मंजूर करेगा या नहीं।
उस शाम समुद्र पर सूर्यास्त अद्भुत था। नारंगी रंग धीरे-धीरे सुनहरा हुआ, फिर लाल और अंत में बैंगनी।
कुछ मिनटों तक चारों चुप रहे।
रिशभ ने कहा, “काश कैमरा लाए होते।”
अपेक्षा मुस्कुराई।
“क्यों?”
“ताकि साबित कर सकें कि यह सच में हुआ था।”
“कुछ चीजें photograph से ज्यादा अच्छी memory होती हैं।”
दूसरे दिन सुबह सर्वेश और अपकेक्षा अकेले समुद्र के किनारे खड़े थे।
सर्वेश ने पहली बार अपने मन की बात कही।
“क्या तुम्हें कभी लगता है कि तुमने अपने फैसले खुद लेना भूल दिया है?”
अपेक्षा ने कहा, “अक्सर।”
सर्वेश ने बताया कि farmhouse वाली घटना के बाद विभा उससे नाराज़ हुई थी। उसने माफी माँगी, वादा किया और धीरे-धीरे उसने हर निर्णय में सावधानी बरतना शुरू कर दिया।
“पहले मैं इसलिए मानता था क्योंकि मैंने वादा किया था,” उसने कहा। “फिर इसलिए मानने लगा क्योंकि ऐसा करना आसान था।”
कई बार विभा को कुछ कहने की भी जरूरत नहीं होती थी। सर्वेश पहले ही अनुमान लगा लेता था कि वह क्या चाहेगी।
अपेक्षा ने समझा कि विभा की कठोरता के पीछे भी एक कहानी थी। उसने कम उम्र में शादी की थी। उसके पास अपने लिए बहुत विकल्प नहीं थे। उसके लिए marriage ही security और सफलता का प्रतीक बन गई थी।
लेकिन तान्या विभा नहीं थी।
अपेक्षा ने सर्वेश से कहा, “तुम्हारी बेटी को एक ऐसे पिता की जरूरत है जो उसके लिए बोल सके।”
सर्वेश चुप रहा, लेकिन वह बात उसके भीतर उतर गई।
बाद में बात अपकेक्षा की जिंदगी पर आई।
रिशभ ने उसे चिढ़ाया—“Jatin-Lalit.”
अपेक्षा ने तुरंत कहा, “बस करो।”
लेकिन एक Jatin सच में उसकी जिंदगी में था।
तलाक के बाद उसके बच्चों के पिता उनसे दूर होते गए थे। जatin धीरे-धीरे उनके जीवन का हिस्सा बन गया था। वह स्कूल के काम में मदद करता, अस्पताल ले जाता, homework करवाता और जरूरत के समय उनके साथ खड़ा रहता।
बच्चे उसे “Jatin Uncle” कहते थे।
“उसने कभी उनके पिता की जगह लेने की कोशिश नहीं की,” अपकेक्षा ने कहा। “वह बस ऐसा इंसान बन गया जिस पर वे भरोसा कर सकते हैं।”
“और तुम?” रिशभ ने पूछा।
“वह मेरा best friend है।”
जatin ने उससे शादी के लिए पूछा था, लेकिन उसने मना कर दिया था।
“क्यों?”
“क्योंकि वह बहुत important है।”
रिशभ ने उसे देखा।
“तुमने सात साल यह साबित करने में लगा दिए कि तुम अकेले रह सकती हो। शायद अब यह जानने का समय है कि क्या तुम किसी ऐसे इंसान को अपने पास आने दे सकती हो जो तुम्हें बचाने नहीं, तुम्हारे साथ चलने आया है।”
अपेक्षा के पास कोई जवाब नहीं था।
तीसरे दिन समुद्र बिल्कुल शांत था।
तभी रिशभ ने अपनी बात रखी।
“मैं डरता हूँ।”
“किससे?” निर्जरा ने पूछा।
“Fatherhood से।”
उसने प्रेरणा, शादी और बच्चों की इच्छा के बारे में बताया।
“मैं बच्चे चाहता हूँ,” उसने कहा, “लेकिन मुझे नहीं पता कि मैं अच्छा पिता बन पाऊँगा या नहीं।”
अपेक्षा ने कहा, “कोई नहीं जानता।”
निर्जरा मुस्कुराई।
“शायद डरने का मतलब यह नहीं कि तुम कुछ नहीं चाहते।”
रिशभ ने सिर हिलाया।
“मैं बच्चों को चाहता हूँ। बस यह दिखावा नहीं करना चाहता कि मुझे डर नहीं लगता।”
सर्वेश ने कहा, “तो प्रेरणा से यही कहना।”
रिशभ मुस्कुराया।
“कहूँगा।”
चौथे दिन वे अपने बचपन, परिवार और पुरानी गलतियों की बातें करते रहे। समुद्र की विशालता उनकी समस्याओं को छोटा कर रही थी, और उसकी खामोशी उनके भीतर की आवाज़ को और स्पष्ट।
पाँचवें दिन दूरी का असर दिखने लगा।
अपेक्षा बार-बार अपना फोन देख रही थी, जबकि उसे पता था कि signal नहीं है।
वह जatin को याद कर रही थी।
उसकी छोटी-छोटी आदतें—चाय रख देना, बच्चों के बारे में पूछना, जरूरत पड़ने पर कहना, “चिंता मत करो, मैं संभाल लूँगा।”
सात साल से वह उसकी जिंदगी की रोजमर्रा की लय का हिस्सा था।
अपेक्षा ने कभी उस भावना को प्यार नहीं कहा था।
शायद इसलिए कि प्यार को नाम देना उसे डरावना बना देता।
लेकिन पाँच दिन दूर रहकर उसे एक बात साफ समझ आ गई—
उसे जatin की मदद नहीं, जatin खुद याद आ रहा था।
रिशभ भी प्रेरणा को याद कर रहा था।
उसे अचानक समझ आया कि वह हर छोटी-बड़ी चीज उसके साथ बाँटना चाहता है। उसे लगा कि जिंदगी से कुछ समय दूर रहना आसान था, लेकिन ऐसी जिंदगी की कल्पना करना जिसमें प्रेरणा न हो—यह असंभव था।
“मुझे उसकी याद आ रही है,” उसने कहा।
फिर कुछ देर बाद बोला, “मुझे लगता है मैं तैयार हूँ।”
“Fatherhood के लिए?”
रिशभ ने सिर हिलाया।
“डर अभी भी है।”
सर्वेश मुस्कुराया।
“शायद डर का होना ठीक है।”
दूसरी तरफ निर्जरा अपने बच्चों के बारे में सोच रही थी। उसे उनके स्कूल बैग, घर की आवाजें, उनके झगड़े और उनकी छोटी-छोटी बातें याद आ रही थीं।
अमेरिका एक opportunity था।
लेकिन उसके बच्चे कोई abstract idea नहीं थे। उनकी जिंदगी रोज उसके सामने घट रही थी।
उसने धीरे से कहा, “मैं यह सब नहीं छोड़ सकती।”
उसे अपना जवाब मिल चुका था।
सर्वेश के भीतर एक अलग तरह की शांति थी।
पाँच दिनों से विभा का कोई निर्देश नहीं आया था।
न कोई “सर्वेश जी, यह मत करो”, न “यह पहनिए”, न “ऐसा क्यों किया?”
वह अपनी पसंद के कपड़े पहन रहा था, अपनी पसंद का खाना खा रहा था और बिना किसी की प्रतिक्रिया सोचे हँस रहा था।
तभी उसे एहसास हुआ कि उसने कितने वर्षों से अपना जीवन किसी और की इच्छाओं का अनुमान लगाते हुए जिया था।
उसने अपकेक्षा से कहा, “मैं विभा से नफरत नहीं करता। मैं उससे प्यार करता हूँ। लेकिन कहीं न कहीं मैंने प्यार करने और खुद को किसी दूसरे में खो देने के बीच का फर्क भूल दिया।”
उसने समुद्र की तरफ देखा।
“अब मैं खुद को खोना नहीं चाहता।”
शाम को चारों फिर साथ बैठे।
रिशभ ने कहा, “हम पाँच दिन अपने normal lives से दूर रहने आए थे। अब चारों उसी जिंदगी के बारे में सोच रहे हैं।”
अपेक्षा ने कहा, “शायद दूरी लोगों को भुलाती नहीं।”
“बताती है कि हम सच में किसे miss करते हैं,” रिशभ ने कहा।
“और कभी-कभी यह भी बताती है कि हमारी जिंदगी में क्या missing था,” निर्जरा ने जोड़ा।
छठे दिन मौसम अचानक बदल गया।
आसमान पर काले बादल छा गए। हवा तेज हो गई। समुद्र उग्र होने लगा। जहाज बुरी तरह हिलने लगा और यात्रियों को अंदर रहने के लिए कहा गया।
बारिश शीशों पर जोर से पड़ रही थी। बिजली चमक रही थी।
अचानक किसी ने corridor में चिल्लाकर कहा—
“Tsunami!”
लोग घबरा गए।
कुछ देर बाद announcement से स्पष्ट किया गया कि tsunami की कोई warning नहीं थी। जहाज severe storm और rough seas से गुजर रहा था।
लेकिन उस एक शब्द ने सभी को डरा दिया था।
चारों cousins साथ बैठे रहे।
रिशभ ने कहा, “अगर हम इससे बच गए तो…”
अपेक्षा ने उसे रोका।
“जब हम इससे बचेंगे।”
रिशभ मुस्कुराया।
“जब हम बचेंगे, मैं प्रेरणा को सब बताऊँगा। कि मुझे डर लगता है और फिर भी मैं उसके साथ बच्चे चाहता हूँ।”
अपेक्षा ने कहा, “मैं जatin को फोन करूँगी।”
“Finally!” रिशभ हँसा।
“शादी का वादा नहीं कर रही,” उसने कहा। “सिर्फ बातचीत का।”
निर्जरा ने कहा, “मैं हर्ष से कहूँगी कि मैं भारत में रहना चाहती हूँ।”
सबने सर्वेश की ओर देखा।
उसने गहरी साँस ली।
“मैं तान्या से बात करूँगा।”
“उस लड़के के बारे में?”
“सब कुछ।”
फिर उसने कहा—
“मैं उसे बताऊँगा कि उसके पास choice है।”
“और विभा?” अपकेक्षा ने पूछा।
“उससे भी बात करूँगा।”
तभी जहाज एक विशाल लहर से टकराया।
चारों कुछ देर चुप रहे।
तूफान पूरी रात चलता रहा।
किसी समय चारों ने एक-दूसरे का हाथ पकड़ लिया।
न कोई मजाक था, न कोई philosophy।
बस चार लोग थे, जो सुबह होने का इंतजार कर रहे थे।
फिर धीरे-धीरे हवा शांत हुई।
लहरें छोटी होने लगीं।
अंधेरा छंटा।
सुबह समुद्र फिर शांत था—लगभग अविश्वसनीय रूप से शांत।
सूरज की सुनहरी रोशनी पानी पर फैल रही थी।
अपेक्षा ने कहा, “कितना सुंदर है।”
“इतना सब करने के बाद भी?” रिशभ ने पूछा।
“शायद इसी वजह से ज्यादा सुंदर है।”
उसने कहा, “शायद जिंदगी के storms से बच निकलना ऐसा ही होता है। हम ऐसे इंसान नहीं बन जाते जिन्हें कभी तूफान नहीं मिलता। हम ऐसे इंसान बन जाते हैं जो जानते हैं कि तूफान गुजर जाते हैं।”
सर्वेश ने क्षितिज की ओर देखा।
“समुद्र नहीं बदला।”
तीनों उसकी ओर देखने लगे।
“हम बदल गए।”
किसी ने उससे असहमति नहीं की।
तूफान ने उन्हें वह दिखाया था जो शांत समुद्र नहीं दिखा सकता था।
शांति का मतलब तूफान का न होना नहीं था। कभी-कभी शांति उस एहसास का नाम थी जो तूफान से बच निकलने के बाद आती है।
आखिरी सुबह चारों ने अपने-अपने निर्णय दोहराए।
निर्जरा हर्ष से कहेगी कि वह भारत में रहना चाहती है। वह उसके अवसर का सम्मान करेगी, लेकिन अपनी जिंदगी का त्याग नहीं करेगी।
रिशभ प्रेरणा को बताएगा कि उसे पिता बनने से डर लगता है, लेकिन वह उस डर के साथ भी उसके साथ आगे बढ़ना चाहता है।
अपेक्षा जatin को फोन करेगी। इसलिए नहीं कि उसने अचानक शादी करने का फैसला कर लिया था, बल्कि इसलिए कि उसने समझ लिया था—प्यार खोने के डर से प्यार को स्वीकार ही न करना भी जीवन से दूर भागने का एक तरीका है।
और सर्वेश बोलेगा।
तान्या से भी।
विभा से भी।
क्योंकि उसकी चुप्पी ने घर में शांति तो बनाए रखी थी, लेकिन उसकी बेटी की रक्षा नहीं की थी।
जब जहाज बंदरगाह के पास पहुँचा तो mobile signal वापस आ गया।
चारों फोन एक साथ vibrate करने लगे।
Messages. Missed calls. Notifications.
दुनिया फिर लौट आई थी।
सर्वेश ने अपना फोन देखा।
पहला संदेश तान्या का था—
“Papa, did you have a good trip?”
वह मुस्कुराया।
फिर विभा का संदेश आया—
“सुनिए सर्वेश जी, मुझे लगता है मुझे हमारा son-in-law मिल गया है।”
सात साल पहले सर्वेश बिना सोचे जवाब दे देता।
इस बार उसने लिखा—
“नहीं विभा, इस बारे में हमें बात करनी होगी।”
उसने message दोबारा पढ़ा।
उसमें गुस्सा नहीं था।
विद्रोह नहीं था।
अपमान नहीं था।
सिर्फ एक सीमा थी।
उसने send कर दिया।
रिशभ ने पूछा, “क्या कहा उसने?”
सर्वेश ने फोन जेब में रख लिया।
“ऐसी बात है जिस पर घर जाकर चर्चा करेंगे।”
रिशभ मुस्कुराया।
“Dangerous लगता है।”
सर्वेश ने बंदरगाह की ओर देखते हुए कहा—
“नहीं।”
फिर थोड़ा रुककर बोला—
“Necessary लगता है।”
जहाज किनारे लग गया।
चारों cousins कुछ क्षण साथ खड़े रहे, फिर gangway से नीचे उतरने लगे।
सात दिन पहले वे अपनी-अपनी जिंदगी को समझने का भ्रम लेकर जहाज पर चढ़े थे।
अब वे चार अलग-अलग तरह का साहस लेकर लौट रहे थे।
निर्जरा ने समझा था कि रुक जाना किसी अवसर को गंवाना नहीं, बल्कि अपनी जिंदगी के लिए एक सचेत चुनाव भी हो सकता है।
रिशभ ने जाना कि पिता बनने से डरना यह साबित नहीं करता कि वह अच्छा पिता नहीं बन सकता।
अपेक्षा ने समझा कि खुद को प्यार में चोट लगने से बचाते-बचाते उसने शायद खुद को प्यार पाने से भी रोक रखा था।
और सर्वेश ने जाना कि चुप्पी शांति बचा सकती है, लेकिन अपनी बेटी की रक्षा के लिए शब्दों की जरूरत होती है।
पीछे समुद्र शांत था।
लगभग मासूम।
लेकिन अब वे उसे बेहतर समझते थे।
समुद्र शांत भी हो सकता था।
उग्र भी।
वह डरा भी सकता था और सुकून भी दे सकता था।
जिंदगी भी ऐसी ही थी।
तूफान आएँगे।
वे हमेशा आएँगे।
असल फर्क इस बात से पड़ेगा कि तूफान से बच निकलने के बाद हम क्या करते हैं।
चारों cousins जमीन पर उतर गए।
समुद्र के साथ उनका वह सप्ताह समाप्त हो चुका था।
लेकिन उनकी असली यात्राएँ अब शुरू हुई थीं।
समुद्र में वह सप्ताह

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