संयुक्त पङोस



सनराइज़ रेज़िडेंसी की तीसरी मंज़िल पर स्थित फ्लैट नंबर 401, 402 और 403 धीरे-धीरे ऐसे हो गए थे, जैसे वे तीन अलग-अलग घर नहीं, बल्कि एक ही घर के हिस्से हों।

401 में योगेश और गीतांजलि अपने चार साल के बेटे श्लोक के साथ रहते थे।

दोनों की उम्र चौंतीस वर्ष थी और दोनों HR मैनेजर थे। उनकी मुलाकात काम के दौरान हुई थी, प्यार हुआ और फिर उन्होंने शादी कर ली। शादी के सात साल बाद भी वे ऐसे दंपति थे, जिन पर हर किसी की नज़र चली जाती थी। योगेश आकर्षक और आत्मविश्वासी था, जबकि गीतांजलि बेहद खूबसूरत थी। उनके सहकर्मी मज़ाक में कहते थे कि वे आज भी नए-नवेले दंपति की तरह रहते हैं।

फिर था श्लोक।

चार साल की उम्र में उसने यह खोज लिया था कि दुनिया में हर चीज़ के बारे में सवाल पूछे जा सकते हैं।

“मम्मा, चाँद गाड़ी के साथ-साथ क्यों चलता है?”

“पापा, कुत्ते बोल क्यों नहीं सकते?”

“मम्मा, क्या मैं कल बड़ा हो जाऊँगा?”

अक्सर उसके सवाल उस समय आते थे जब एक माता-पिता किसी कॉल पर होते और दूसरा किसी काम को जल्दी-जल्दी पूरा करने में लगा होता।

उनके पड़ोसी, 403 में रहने वाले लोग, उनकी मदद कर देते थे।

चवालीस वर्षीय स्कूल शिक्षक जीतेंद्र दोपहर दो बजे घर लौट आते थे और अक्सर दोपहर का समय श्लोक के साथ बिताते थे। कविता को भी श्लोक बहुत प्यारा था।

और श्लोक भी उन दोनों से बहुत प्यार करता था।

402 में अर्णव और सुमन रहते थे। दोनों चौबीस वर्ष के थे और उनकी हाल ही में शादी हुई थी।

अर्णव लंबा, गोरा और आकर्षक युवक था। उसके चेहरे पर एक सहज, चॉकलेटी हीरो जैसी मासूमियत थी। उसके IT ऑफिस में कई लड़कियाँ उस पर आकर्षित थीं।

लेकिन घर के दरवाज़े के भीतर कदम रखते ही इन सब बातों का कोई महत्व नहीं रह जाता था।

“अर्णव?”

“जी, सुमन जी?”

“नाश्ता।”

“ज़रूर, सुमन जी।”

वह तुरंत रसोई की ओर भागा।

“अर्णव, रिमोट।”

अर्णव वापस बैठक में आया और उसे रिमोट दिया। जैसे ही वह रसोई की ओर लौटने लगा, एक और काम बता दिया गया, फिर एक और।

जीतेंद्र और कविता की चौदह वर्षीय बेटी रिया को यह सब देखना बहुत अच्छा लगता था।

वह हाल के दिनों में अपने घर से अधिक समय 402 में बिताने लगी थी।

वह सुमन के पास सोफ़े पर बैठती, टीवी देखती और उससे बातें करती।

“भाभी।”

“हम्म?”

“चाय?”

सुमन ने रसोई की ओर देखा।

“अर्णव?”

अर्णव तुरंत बैठक में आ गया।

“जी, डार्लिंग?”

वह संयत मुस्कान के साथ सीधा खड़ा हो गया।

“चाय, प्लीज़,” सुमन ने कहा।

“अदरक डालना मत भूलना।”

“ज़रूर, मेरी जान।”

कुछ मिनट बीते।

रिया ने सुमन की ओर देखा।

“भाभी?”

“क्या?”

“पकौड़े?”

सुमन मुस्कुराई।

“अर्णव।”

“जी, सुमन?”

“कुछ पकौड़े बना सकते हो?”

“आपका हुक्म सिर आँखों पर, स्वीटहार्ट।”

रिया ने टीवी की ओर मुँह कर लिया, ताकि उसकी मुस्कान दिखाई न दे।

अर्णव कुछ पल के लिए दरवाज़े पर आया। उसने रिया की ओर देखा।

रिया मासूम बनकर स्क्रीन को देखने लगी।

अर्णव ने सिर हिलाया और फिर रसोई में चला गया।

सुमन को कुछ पता ही नहीं चला।

रिया को यह घर केवल खाने-पीने की वजह से पसंद नहीं था।

यहाँ कोई उसे “छोटी बच्ची” नहीं कहता था।

वह सुमन से असहमत हो सकती थी।

वह अर्णव को छेड़ सकती थी।

वह स्कूल की बातें कर सकती थी, बिना इस डर के कि कोई तुरंत उसे भाषण देना शुरू कर देगा।

अपने घर में हालात अलग थे।

एक शाम कविता ने कहा, “रिया, तुम्हें घर का काम सीखना चाहिए।”

“सीख लूँगी।”

“फिर?”

रिया ने पूछा, “हमेशा इसलिए क्यों, क्योंकि मैं लड़की हूँ?”

जीतेंद्र ने अख़बार से नज़र उठाई।

“ऐसा किसी ने नहीं कहा।”

“कल आपने यही कहा था।”

“हम तुम्हें ज़िंदगी के लिए तैयार कर रहे हैं।”

रिया ने जवाब दिया, “तो मुझे ज़िंदगी के लिए तैयार कीजिए। पत्नी बनने के लिए नहीं।”

वह वहाँ से चली गई।

जीतेंद्र ने अख़बार मोड़ दिया।

कविता ने लंबी साँस ली।

दोनों के पास कहने के लिए कुछ नहीं था।

401 में समस्या थोड़ी शांत थी।

एक शाम गीतांजलि घर लौटी तो उसने देखा कि श्लोक अपने खिलौना कारों के साथ फर्श पर बैठा था।

“मम्मा!”

वह दौड़कर उसके पास आया।

गीतांजलि ने अपना बैग नीचे रखा और उसे गले लगा लिया।

श्लोक तुरंत अपने दोपहर के अनुभव के बारे में बताने लगा।

तभी गीतांजलि का फोन वाइब्रेट हुआ।

उसने नीचे देखा।

जब उसने दोबारा श्लोक की ओर देखा, तो वह चुप हो चुका था।

“मम्मा?”

“हाँ?”

“आप मेरी बात नहीं सुन रही थीं।”

उसने फोन उल्टा करके रख दिया।

“फिर से बताओ।”

श्लोक ने दोबारा बताना शुरू किया।

इस बार उसने ध्यान से सुना।

उस रात बाद में उसने योगेश को उनके सोते हुए बेटे के पास बैठे देखा।

“उसने आज मुझसे कुछ पूछा था,” योगेश ने कहा।

“क्या?”

“मुझे याद नहीं।”

गीतांजलि ने श्लोक की ओर देखा।

“वह जल्दी ही पाँच साल का हो जाएगा।”

योगेश ने सिर हिलाया।

कुछ देर दोनों चुप रहे।

अगली सुबह काम के लिए तैयार होते समय योगेश ने कहा,

“तुम्हें नौकरी छोड़ देनी चाहिए।”

गीतांजलि पलटी।

“मैं ही क्यों?”

“तुम उसके साथ ज़्यादा समय बिताना चाहती हो।”

“तुम भी तो चाहते हो।”

“मैं संभाल लूँगा।”

“तो तुम नौकरी छोड़ दो।”

वह मुस्कुराया।

“तुम ज़्यादा कमाती हो।”

“बात वह नहीं है।”

और सचमुच, बात वह नहीं थी।

अगले कुछ हफ्तों तक यह बातचीत बार-बार होती रही।

फिर एक रविवार को श्लोक दोनों को बैठक में खींचकर ले गया।

“मम्मा। पापा। आओ।”

योगेश ने कहा, “हमारे पास काम है।”

“आओ।”

उसने फर्श पर कई कुशन बिछा रखे थे।

“ये पहाड़ हैं।”

गीतांजलि हँस पड़ी।

“अच्छा?”

“हाँ।”

“और हम क्या हैं?”

“पर्वतारोही।”

योगेश ने गीतांजलि की ओर देखा।

उसने अपना फोन एक तरफ रख दिया।

“चलो।”

दोनों फर्श पर बैठ गए।

श्लोक उनके ऊपर चढ़ने लगा, कुशन गिराने लगा और फिर उनसे उन्हें दोबारा बनाने को कहने लगा।

एक घंटे बाद योगेश की शर्ट धूल से भर चुकी थी और गीतांजलि के बाल खुल गए थे।

श्लोक हँस रहा था।

योगेश ने गीतांजलि की ओर देखा।

उसने भी उसकी ओर देखा।

दोनों में से किसी ने अपना फोन नहीं उठाया।

उस शाम उन्होंने अपने लैपटॉप खोले।

काम के लिए नहीं।

नौकरी से इस्तीफ़ा देने के लिए।

यह आसान फैसला नहीं था।

लेकिन उन्होंने इसे साथ मिलकर लिया।

आख़िरकार योगेश ने शेयर बाज़ार में गंभीरता से ट्रेडिंग शुरू कर दी। उसकी सुबह रिपोर्ट पढ़ने, कंपनियों का अध्ययन करने और बाज़ार पर नज़र रखने में गुजरने लगी।

गीतांजलि को घर से किया जा सकने वाला HR का काम मिल गया।

403 में रिया भी बदल रही थी।

यह सबसे पहले जीतेंद्र ने महसूस किया।

एक दोपहर वह घर आई, अपना बैग सोफ़े पर फेंका और बोली,

“बाबा, मुझे आपकी राय चाहिए।”

उसने अख़बार नीचे रख दिया।

“क्या हुआ?”

रिया ने उसे पूरी बात बताई।

वह सुनता रहा।

जब वह समाप्त हुई, तो उसने तुरंत यह नहीं बताया कि रिया ने क्या गलत किया था।

उसने पूछा,

“तुम क्या करतीं?”

रिया उसे देखने लगी।

“मुझे नहीं पता।”

“सोचो।”

वह उसके पास बैठ गई।

“क्या मैं यहाँ बैठ सकती हूँ?”

जीतेंद्र ने अपने कागज़ एक तरफ कर दिए।

“बिल्कुल।”

वह वहीं बैठी रही।

कविता ने रसोई से दोनों को देखा।

अगली शाम रिया घर आई तो उसने अपनी माँ को कपड़े तह करते देखा।

“मम्मा।”

“हम्म?”

“आपको पता है सुमन भाभी ने क्या कहा?”

कविता मुस्कुराई।

“क्या?”

रिया उसके पास बैठ गई और बातें करने लगी।

कविता कपड़े तह करती रही।

उसने बीच में उसे नहीं रोका।

जब रिया अपनी बात पूरी कर चुकी, तो कविता ने पूछा,

“तुम्हें क्या लगता है?”

रिया मुस्कुराई।

“मुझे लगता है, आप आखिरकार मेरी राय पूछ रही हैं।”

कविता हँस पड़ी।

“शायद मैं भी सीख रही हूँ।”

रिया उसके कंधे से लग गई।

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