तीन साल बीत चुके थे उस घटना को, जब दूसरी मंज़िल के बच्चों ने 401, 402 और 403 के फ्लैट नंबर बदल दिए थे और तीनों परिवारों में खूब अफरा-तफरी मची थी। अब वह घटना उनके लिए एक मज़ेदार पुरानी याद बन चुकी थी।
फ्लैट 401 में उनतालीस साल के योगेश और गीतांजलि अपने नौ साल के बेटे श्लोक के साथ रहते थे। श्लोक अब पूरे पड़ोस का सिरदर्द बन चुका था, हालांकि पढ़ाई में वह अपनी क्लास का टॉपर था। फ्लैट 403 में रिया अब मेडिकल कॉलेज पहुँच चुकी थी और अपनी माँ कविता की बढ़ती टिफिन सर्विस में भी मदद करती थी। जितेंद्र को अपनी बेटी और पत्नी, दोनों पर गर्व था। फ्लैट 402 में अरनव और सुमन की ज़िंदगी अपनी पुरानी लय में चल रही थी।
एक शाम गीतांजलि ने श्लोक को भागते हुए देखा।
“अब ये बड़ा हो रहा है।”
योगेश ने अपने बेटे को देखा, जो इस समय तीन बिस्कुट माथे पर संतुलित करने की कोशिश कर रहा था।
“तुम्हें पक्का यकीन है?”
“योगेश!”
“ठीक है।”
गीतांजलि हँसी।
“हमें अपना स्टार्टअप शुरू करना चाहिए।”
“वही, जिसकी हम सालों से बात कर रहे हैं?”
“हाँ। अब और नहीं टालेंगे।”
दोनों मुस्कुरा दिए।
उधर सुमन ने फ्लैट 402 का मेकओवर करने का फैसला किया।
“अरनव, हम घर सजाएँगे।”
अरनव ने लैपटॉप से नज़र उठाई।
“हाँ, सुमन जी?”
“ये पर्दे बदलने हैं।”
“जैसा आप कहें, सुमन जी।”
“सोफा भी अपनी जगह बदलेगा।”
“ज़रूर, सुमन जी।”
“नई लाइट्स भी लगेंगी।”
“बिल्कुल, सुमन जी।”
अगले कुछ हफ्तों तक अरनव ने इलेक्ट्रिशियन, पेंटर, कारपेंटर और डिलीवरी वालों के बीच भागदौड़ करते हुए घर को नया रूप दे दिया। आखिरकार सुमन ने पार्टी रखी।
मेहमानों में मौजूद महिलाओं ने सजावट से ज्यादा ध्यान अरनव पर दिया। वह प्लेटें लगा रहा था, स्नैक्स रख रहा था और सुमन के निर्देशों का पालन कर रहा था।
“अरनव!”
“हाँ, सुमन जी?”
“सोफे के पास और स्नैक्स रख दो।”
“अभी लाया, सुमन जी।”
एक महिला ने दूसरी से कहा, “मेरे पति को तो पता भी नहीं चलता कि मेहमानों को खाना चाहिए।”
दूसरी बोली, “काश मेरे पति भी अरनव जैसे होते।”
कुछ ही दिनों में कई पतियों को अपने घरों में अरनव की मिसाल सुननी पड़ी।
“अरनव की तरह घर में हाथ बँटाओ।”
“सुमन के पति को देखो।”
जब सुमन ने अरनव को बताया तो वह हँस पड़ा।
“हाँ, सुमन जी, लगता है मैंने पूरे पड़ोस के लिए मुसीबत खड़ी कर दी।”
सुमन मुस्कुरा दी।
फिर एक शाम मौसम अचानक बिगड़ गया।
आसमान काला हो गया, तेज़ हवाएँ चलने लगीं और बिजली बार-बार चमकने लगी। कुछ ही देर में भयंकर तूफान शुरू हो गया।
फ्लैट 403 में रिया पढ़ रही थी। तेज़ गड़गड़ाहट पर उसने किताब बंद की और अपने माता-पिता के हाथ पकड़ लिए।
“बहुत तेज़ था।”
कविता ने उसे अपने पास कर लिया।
फ्लैट 401 में श्लोक डरकर गीतांजलि से चिपक गया।
“माँ!”
“कुछ नहीं हुआ। मैं हूँ।”
फ्लैट 402 में सुमन खिड़की से दूर होकर अरनव के पास आई।
“अरनव।”
“हाँ, सुमन जी?”
“मुझे डर लग रहा है।”
अरनव ने उसे बाँहों में ले लिया।
“डरिए मत, सुमन जी। मैं आपके साथ हूँ।”
तभी बिजली चली गई।
पूरा अपार्टमेंट अँधेरे में डूब गया।
बच्चों और महिलाओं की चीखें सुनाई देने लगीं। कुछ लोग टॉर्च लेकर कॉरिडोर में आए ही थे कि नीचे से आवाज़ गूँजी—
“चोर!”
फिर किसी ने चिल्लाया, “बिल्डिंग में चोर है! वो ऊपर भागा है!”
डर फैल गया।
एक परिवार ने दावा किया कि उन्होंने एक आदमी को नीचे देखा था, जो उनके चिल्लाने पर ऊपर भागा।
योगेश ने सबको शांत किया।
“सब लोग साथ रहो।”
जितेंद्र ने पूछा, “किसी ने उसे ठीक से देखा?”
“गहरे कपड़े पहने थे। ऊपर भागा है।”
अरनव ने मोबाइल की टॉर्च जलाई।
“चलो, फ्लैट चेक करते हैं।”
उन्होंने 401, 402 और 403 के साथ-साथ सीढ़ियाँ, स्टोर और बालकनियाँ भी देखीं।
कोई नहीं मिला।
फिर भी डर खत्म नहीं हुआ।
तूफान इतना तेज़ था कि मोबाइल नेटवर्क और इंटरनेट लगभग बंद हो चुके थे। कॉल कट रही थीं और मैसेज तक नहीं जा रहे थे।
योगेश ने जितेंद्र से कहा, “सबको कॉमन एरिया में बुलाते हैं। अकेले बैठना ठीक नहीं।”
अरनव ने कुर्सियाँ लगानी शुरू कर दीं।
“गीतांजलि, ये कुर्सियाँ इधर कर दें?”
“हाँ।”
कविता और रिया तैयार टिफिन और स्नैक्स ले आईं।
“कम से कम किसी को भूखा नहीं रहना पड़ेगा,” कविता ने कहा।
सब लोग कॉमन एरिया में इकट्ठा हो गए।
अरनव ने योगेश से पूछा, “योगी भैया, डीजी सेट?”
“कल आएगा। आज की रात किसी तरह निकालनी पड़ेगी।”
योगेश और अरनव ने सीसीटीवी देखने की कोशिश की, लेकिन बिजली की गड़बड़ी के कारण कैमरे ठीक से काम नहीं कर रहे थे।
अरनव ने स्क्रीन देखकर कहा, “कुछ काम का नहीं मिल रहा।”
योगेश ने सिर हिलाया।
“तो हमें अब भी नहीं पता कि चोर था या नहीं।”
“नहीं, योगी भैया।”
दोनों वापस कॉमन एरिया में आ गए।
डर अभी भी था।
तभी सुमन ने ताली बजाई।
“बस! हम पूरी रात डरकर नहीं बैठेंगे।”
सबने उसकी तरफ देखा।
“अंताक्षरी खेलेंगे।”
रिया हँस पड़ी।
“अच्छा आइडिया है।”
सुमन ने कहा, “बिजली नहीं है तो क्या हुआ? आवाज़ तो है।”
अंताक्षरी शुरू हुई। फिर डम्ब शराड्स।
धीरे-धीरे डर कम होने लगा और हँसी बढ़ने लगी।
फिर बातचीत शुरू हुई।
जितेंद्र और कविता की लव मैरिज का पता चला।
योगेश ने आश्चर्य से पूछा, “आपने कभी बताया ही नहीं!”
जितेंद्र हँसा।
“किसी ने पूछा ही नहीं।”
फिर बात योगेश और गीतांजलि पर आई।
गीतांजलि ने हँसते हुए कहा, “मैंने इसे प्रपोज़ किया था।”
सब योगेश की तरफ देखने लगे।
“सच?”
“हाँ,” योगेश ने कहा।
“ये बहुत देर लगा रहा था,” गीतांजलि बोली।
योगेश ने सफाई दी, “मैं सम्मान कर रहा था।”
“तुम कन्फ्यूज़ थे।”
सब हँस पड़े।
फिर किसी ने अरनव से पूछा कि आईटी में आने से पहले वह क्या करता था।
“कुछ खास नहीं,” अरनव ने कहा।
सुमन तुरंत बोली, “झूठ बोल रहा है।”
अरनव ने उसकी तरफ देखा।
“जी सुमन?”
“बताओ।”
सुमन ने सबको बताया, “आईटी जीनियस बनने से पहले ये स्टेट लेवल बॉक्सिंग चैंपियन था।”
सब हैरान रह गए।
जितेंद्र ने पूछा, “तुम?”
अरनव हँसा।
“हाँ। कॉलेज के बाद छोड़ दी।”
सुमन बोली, “ये आधे पड़ोसियों को हरा सकता था।”
अरनव तुरंत बोला, “सुमन जी, प्लीज़।”
सब हँस पड़े।
फिर किसी ने सुमन से पूछा कि वह इतनी बेबाक कैसे बनी।
कुछ पल चुप रहने के बाद उसने बताया कि स्कूल और कॉलेज में उसे लगातार बुली किया गया था। लोगों के व्यवहार ने उसे अंदर से बहुत प्रभावित किया था। समय के साथ उसने खुद को मजबूत और मुखर बनाना सीख लिया।
“इसीलिए मैं बॉसी हूँ,” उसने हल्के से कहा।
अरनव मुस्कुराया।
“आप तो हमेशा से बॉसी थीं, सुमन जी।”
सुमन ने उसके हाथ पर चपत लगाई।
“अरनव!”
“हाँ, सुमन जी?”
सब फिर हँस पड़े।
कुछ देर बाद रिया की बारी आई।
उसने बताया कि मेडिकल कॉलेज बहुत कठिन है, लेकिन उसे पसंद है।
फिर उसके रिश्ते की बात सामने आई।
जितेंद्र ने चौंककर कविता को देखा।
“तुम्हें पता था?”
“बिल्कुल।”
“मुझे क्यों नहीं बताया?”
कविता हँसी।
“तुम जाँच-पड़ताल शुरू कर देते।”
रिया ने बताया कि वह एक गंभीर रिश्ते में है और दोनों अपने भविष्य और पढ़ाई को लेकर गंभीर हैं।
जितेंद्र ने कुछ पल सोचा।
“बस समझदारी से आगे बढ़ना।”
रिया मुस्कुराई।
“हम समझते हैं।”
कविता ने उसका हाथ पकड़ लिया।
“मुझे अपनी बेटी पर भरोसा है।”
फिर किसी ने श्लोक से पूछा, “तुम स्कूल में कैसे कर रहे हो?”
श्लोक ने गर्व से कहा, “मैं क्लास टॉपर हूँ।”
योगेश चौंका।
“सच?”
“पापा!”
गीतांजलि हँस पड़ी।
“तुम्हें नहीं पता था?”
श्लोक बोला, “मैं नंबर वन हूँ।”
सबने तालियाँ बजाईं।
योगेश ने सिर हिलाया।
“पड़ोस का सिरदर्द और क्लास टॉपर।”
श्लोक मुस्कुराया।
“दोनों।”
रात आगे बढ़ती रही।
तूफान धीरे-धीरे कमजोर पड़ गया, लेकिन बातचीत चलती रही।
उस रात उन्होंने एक-दूसरे के वे रूप देखे जिन्हें रोज़मर्रा की ज़िंदगी में कभी नहीं देखा था।
उन्हें पता चला कि जितेंद्र और कविता ने प्रेम विवाह किया था, गीतांजलि ने योगेश को प्रपोज़ किया था, अरनव कभी स्टेट लेवल बॉक्सर था, सुमन के दबंग स्वभाव के पीछे पुराने अनुभव थे, रिया अपने जीवन और रिश्ते को लेकर गंभीर थी और श्लोक सिर्फ शरारती बच्चा नहीं बल्कि क्लास टॉपर भी था।
सुबह तक बारिश कम हो चुकी थी।
किसी ने अचानक पूछा, “चोर का क्या हुआ?”
सब चुप हो गए।
सीसीटीवी में कुछ नहीं मिला था।
किसी की चीज़ चोरी नहीं हुई थी।
कोई दरवाज़ा टूटा नहीं था।
जिस परिवार ने चोर देखा होने का दावा किया था, वह अपनी बात पर कायम था, लेकिन कोई प्रमाण नहीं था।
शायद सच में चोर था।
शायद अँधेरे में किसी ने किसी पड़ोसी को अजनबी समझ लिया था।
शायद तूफान और डर ने मिलकर एक कहानी बना दी थी।
किसी को कभी पता नहीं चला।
लेकिन अब किसी को इसकी खास परवाह भी नहीं थी।
उस रात का ब्लैकआउट पड़ोस को हमेशा के लिए बदल चुका था।
अँधेरे ने उनके बीच की अदृश्य दीवारें गिरा दी थीं।
पूर्वाग्रह टूटे थे।
पुरानी धारणाएँ बदली थीं।
और वर्षों से एक-दूसरे के पड़ोसी रहे लोग पहली बार सच में एक-दूसरे को जान पाए थे।
अगली शाम बिजली वापस आई तो सब अपने-अपने फ्लैट में लौट गए।
लेकिन अब चीज़ें अलग थीं।
कविता और रिया ने टिफिन सर्विस बढ़ाई।
योगेश और गीतांजलि ने अपने स्टार्टअप पर गंभीरता से काम शुरू किया।
अरनव ने उनकी टेक्नोलॉजी में मदद की।
सुमन ने बिना पूछे ब्रांडिंग के सुझाव देने शुरू कर दिए।
जितेंद्र ने व्यावहारिक कामों में हाथ बँटाया।
रिया बच्चों की पढ़ाई में मदद करने लगी।
और श्लोक अब भी पड़ोस का सिरदर्द बना रहा—बस अब सबको पता था कि वह टॉपर भी है।
कई महीने बाद किसी ने मज़ाक में कहा, “फिर से बिजली बंद करवा दें? सब ऐसे ही बैठकर बातें करेंगे।”
सुमन ने तुरंत कहा, “नहीं।”
सब हँस पड़े।
“एक बार काफी था।”
तीनों फ्लैट वहीं थे।
401।
402।
403।
लेकिन अब उनके अंदर रहने वाले लोग सिर्फ तीन अलग-अलग परिवार नहीं थे।
वे एक परिवार बन चुके थे।
किसी को कभी पता नहीं चला कि उस रात सच में चोर था या नहीं।
लेकिन अब इससे कोई फर्क नहीं पड़ता था।
क्योंकि उस अँधेरे में उन्हें सबसे बड़ी चीज़ जो मिली थी, वह कोई चोर नहीं था।
वह थे—एक-दूसरे।
और उसके बाद अगर कभी कोई नया संकट उनके दरवाज़े पर आता, तो इस पड़ोस में कोई भी उसे अकेले नहीं झेलता।
वो तूफान की रात

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