मनोकामनाओं का कुआँ


गाँव के किनारे, जहाँ आख़िरी घर खेतों में बदलने लगते थे, वहाँ पत्थरों से बना एक पुराना कुआँ खड़ा था।

किसी को ठीक-ठीक नहीं मालूम था कि मैं कितना पुराना हूँ।

बुज़ुर्ग कहते थे कि सदियों पहले एक महान संत वहाँ रुके थे, उन्होंने अपनी छड़ी से धरती पर प्रहार किया था और पानी को आशीर्वाद दिया था। कुछ और लोग कहते थे कि वह कुआँ संत के आने से भी बहुत पहले से वहाँ मौजूद था।

अब इस बात पर कोई बहस नहीं करता था।

सब मुझे बस संत का कुआँ कहते थे।

मुझसे थोड़ी दूर, नीम के पेड़ के नीचे एक चाय की दुकान थी। चार लकड़ी की बेंचें, एक काली पड़ चुकी केतली, बिस्कुट के दो काँच के जार और टीन की छत—जो पठार की ओर से हवा चलने पर खड़खड़ाने लगती थी।

चाय की दुकान और मेरे बीच वही सड़क थी, जिसका इस्तेमाल गाँव का हर व्यक्ति करता था।

लोग मेरे पास तब आते थे जब उन्हें कुछ चाहिए होता था।

और जब वे उस इच्छा के बारे में बात करना चाहते थे, तो चाय की दुकान पर चले जाते थे।

उस सुबह सबसे पहले सज्जन आया।

वह इधर-उधर देखने लगा, हालाँकि आसपास कोई नहीं था।

वह मेरे पास बैठ गया और अपनी जेब से एक सिक्का निकाला।

“भीम को इंदौर में वह नौकरी मिल जाए।”

वह रुका।

“जल्दी मिल जाए।”

फिर एक पल रुका।

“और वह एकता को भूल जाए।”

सिक्का गिरा।

उसने पानी पर एक बार टकराने की आवाज़ की और फिर गायब हो गया।

सज्जन खड़ा हुआ, अपने घुटनों से धूल झाड़ी और सीधे चाय की दुकान की ओर चला गया।

भीम वहाँ पहले से मौजूद था।

“देर हो गई,” भीम ने कहा।

“काम था।”

“तुम्हें? कैसा काम?”

सज्जन ने उसके बगल की खाली कुर्सी खींच ली।

“चाय पी।”

भीम हँस पड़ा।

दोनों बचपन से दोस्त थे। कंधे से कंधा मिलाकर बैठते, क्रिकेट पर बहस करते, एक-दूसरे से पैसे उधार लेते और यह तक जानते थे कि किस घर में सबसे अच्छे अचार रखे जाते हैं।

चायवाले ने सज्जन के सामने एक और गिलास रख दिया।

भीम ने उसकी ओर बिस्कुट का जार बढ़ाया।

“आख़िरी वाला तुम ले लो।”

“तुम ले लो।”

“तुम हमेशा यही कहते हो।”

“तो ले लो।”

दोनों हँस पड़े।

दोनों में से किसी को नहीं मालूम था कि उस सुबह दूसरे ने मेरे सामने क्या माँगा था।

या शायद दोनों को कुछ अंदाज़ा था।

सड़क के उस पार एकता किताबों का ढेर सीने से लगाए गुज़री।

भीम ने बोलना बंद कर दिया।

सज्जन ने अपनी चाय की ओर देखा।

चायवाले ने दोनों को देखा और कुछ नहीं कहा।

एकता ने दुकान की ओर देखा तक नहीं।

वह आगे बढ़ गई।

—

अगली दोपहर दीपक मेरे पास आया।

उसके हाथ में पीतल का लोटा था।

उसने उसमें पानी भरा, उसे दीवार के पास रखा और पानी में झाँकता रहा।

वह तुरंत कुछ नहीं बोला।

फिर उसने अपनी जेब से एक सिक्का निकाला।

“उसे सुरक्षित रखना।”

उसने सिक्का गिरा दिया।

“उसे खुश रखना।”

एक और सिक्का।

“उसका पति उसका ख़याल रखे।”

वह कुछ देर वहीं खड़ा रहा।

फिर लोटा उठाकर घर चला गया।

गाँव में हर कोई रेनू के बारे में जानता था।

सब जानते थे कि दीपक कभी उससे शादी करना चाहता था। सब जानते थे कि उसके माता-पिता ने मना कर दिया था। सब जानते थे कि बात तब ख़त्म हो गई जब एक दूसरा परिवार उसके लिए रिश्ता लेकर आया और गाँव के बुज़ुर्गों ने तय किया कि गौरी उसके लिए सही लड़की है।

अब कोई उस बारे में ज़्यादा बात नहीं करता था।

सबसे कम दीपक।

वह कभी अपने घर में रेनू का नाम नहीं लेता था।

एक बार भी नहीं।

गौरी बिना पूछे ही काफी कुछ जानती थी।

उस शाम दीपक घर आया तो वह आटा गूँध रही थी।

“आज जल्दी आ गए,” उसने कहा।

“काम ख़त्म हो गया।”

उसने चूल्हे में लकड़ी का एक और टुकड़ा डाला।

“हाथ धो लो।”

उसने हाथ धोए।

बाद में जब दोनों खाना खाने बैठे, गौरी ने देखा कि दीपक ने रोटी का सबसे अच्छा टुकड़ा उसके लिए छोड़ दिया था।

“तुम खाओ।”

“मैं खा चुका हूँ।”

“नहीं खाया।”

“खा लिया।”

उसने रोटी उसकी ओर वापस बढ़ा दी।

उसने फिर उसकी ओर बढ़ा दी।

आख़िरकार उसने वह टुकड़ा ले लिया।

अगली सुबह दीपक सूरज निकलने से पहले ही घर से निकल गया।

गौरी दरवाज़े पर खड़ी उसे तब तक देखती रही, जब तक वह घरों के पीछे ओझल नहीं हो गया।

—

चाय की दुकान पर सज्जन और भीम के साथ बकुल और नकुल भी आकर बैठ गए।

दोनों जुड़वाँ भाई इतने एक जैसे दिखते थे कि कभी-कभी चायवाला भी गिलास रखकर इंतज़ार करता रहता था कि दोनों खुद तय करें कि किसका गिलास किसका है।

“तुम ज़्यादा कड़क वाली चाय लो,” बकुल ने कहा।

“तुम हमेशा यही कहते हो।”

“क्योंकि तुम्हें पसंद है।”

“तुम्हें भी पसंद है।”

“तो मुझे दे दो।”

नकुल ने अपना गिलास उसकी ओर बढ़ा दिया।

बकुल ने उसे वापस उसकी ओर धकेल दिया।

दोनों हँस पड़े।

गाँव में हर कोई उनके बारे में अच्छी बातें करता था।

दो भाई, जो कभी झगड़ते नहीं थे।

दो भाई, जो साथ काम करते थे।

दो भाई, जो ज़मीन को कभी अपने बीच नहीं आने देते।

उस शाम बकुल मेरे पास आया।

उसने खेतों की ओर देखा।

फिर सड़क की ओर।

फिर अपनी जेब से एक सिक्का निकाला।

“नकुल को पूरब वाला खेत मिल जाए।”

उसने अपनी आवाज़ धीमी कर ली।

“और पश्चिम वाला खेत मुझे मिल जाए।”

सिक्का पानी में गायब हो गया।

अगली शाम नकुल उसी जगह खड़ा था।

“बकुल को पूरब वाला खेत मिल जाए।”

वह हल्का-सा मुस्कुराया।

“और पश्चिम वाला खेत मुझे मिल जाए।”

उसने सिक्का गिरा दिया।

पानी ने दोनों इच्छाओं को बिना किसी भेदभाव के निगल लिया।

—

अगली सुबह चाय की दुकान पर चारों आदमी साथ बैठे थे।

बकुल कोई कहानी सुना रहा था।

नकुल ने उसे बीच में रोक दिया।

“तुम हमेशा ज़रूरी हिस्सा छोड़ देते हो।”

“तुम्हें ज़रूरी हिस्सा पता ही नहीं।”

“मैं वहाँ था।”

“तुम सो रहे थे।”

सज्जन हँसा।

भीम ने बेंच पर हाथ मारा।

जुड़वाँ भाई भी हँस पड़े।

एक पल के लिए चारों फिर से बच्चों जैसे लग रहे थे।

तभी एकता वहाँ आ गई।

उसने अपनी किताबें बेंच पर रख दीं।

“चाय।”

चायवाले ने चाय डाल दी।

भीम जगह बनाने के लिए थोड़ा खिसक गया।

सज्जन भी खिसक गया।

एकता ने दोनों को देखा।

“इतनी जगह है। तुम दोनों को खिसकने की ज़रूरत नहीं है।”

दोनों ने एक-दूसरे की ओर देखा।

उसने सिर हिलाया और अपनी किताब खोल ली।

“क्या पढ़ रही हो?” भीम ने पूछा।

“इतिहास।”

“क्यों?”

“क्योंकि मुझे पसंद है।”

“टीचर बनोगी?”

“शायद।”

“और क्या?”

“शायद शहर चली जाऊँ।”

दोनों आदमी चुप हो गए।

एकता ने चाय की चुस्की ली।

“मैं ठीक से पढ़ना चाहती हूँ।”

सज्जन ने भीम की ओर देखा।

भीम ने सज्जन की ओर देखा।

एकता ने दोनों को देख लिया।

“क्या?”

“कुछ नहीं,” दोनों ने एक साथ कहा।

वह हँस पड़ी।

—

कुछ दिनों बाद एकता अकेली मेरे पास आई।

शुरुआत में उसके हाथ में कोई सिक्का नहीं था।

उसने गाँव की ओर पीछे मुड़कर देखा।

“मुझे यहाँ का कोई पति नहीं चाहिए।”

वह पत्थर की मुंडेर पर बैठ गई।

“मैं पढ़ना चाहती हूँ।”

उसने एक सिक्का उठाया।

“मैं शहर देखना चाहती हूँ।”

उसने सिक्का गिरा दिया।

“मैं जानना चाहती हूँ कि इस सड़क के आगे क्या है।”

एक और सिक्का।

उसने पानी की आवाज़ सुनी।

फिर चली गई।

—

चाय की दुकान वही जगह बनी रही जहाँ हर कोई यह दिखावा करता था कि कुछ हुआ ही नहीं।

सज्जन और भीम अब भी साथ बैठते थे।

बकुल और नकुल अब भी साथ खाना खाते थे।

एकता अब भी अपनी किताबों के साथ आती थी।

दीपक अब भी बिना चीनी की चाय पीता था।

गौरी कभी-कभी बाज़ार से लौटते हुए वहाँ रुकती थी।

किसी को नहीं मालूम था कि दूसरे ने मेरे सामने क्या माँगा था।

लेकिन इच्छाएँ हमेशा इच्छाएँ बनकर नहीं रहतीं।

सबसे पहले सरकारी सर्वेक्षक आए।

फिर नापने वाली जंजीरें लेकर आदमी आए।

फिर खेतों के किनारे सफेद रंग से रंगे पत्थर दिखाई देने लगे।

सड़क चौड़ी होने वाली थी।

गाँव से होकर विकास की एक परियोजना गुजरने वाली थी।

कई खेतों को जाना था।

पूरब वाला खेत भी।

और पश्चिम वाला भी।

उस दोपहर बकुल और नकुल अपने खेतों के किनारे खड़े थे।

दोनों में से कोई कुछ नहीं बोला।

आख़िरकार बकुल ने कहा,

“तो।”

नकुल ने उसकी ओर देखा।

“तो।”

एक सप्ताह बाद कागज़ों पर हस्ताक्षर हो गए।

दोनों भाइयों को मुआवज़ा मिल गया।

खेत चले गए।

चाय की दुकान पर दोनों साथ बैठे।

बकुल ने दो चाय मँगाई।

नकुल ने एक उठा ली।

“तुम्हारी चाय में ज़्यादा चीनी है।”

“मैंने तुम्हें दी है।”

“मुझे पता है।”

दोनों मुस्कुराए।

किसी ने खेतों का ज़िक्र नहीं किया।

—

उसी साल एकता की शादी तय हो गई।

दूसरे गाँव का एक परिवार था।

चाय की दुकान से उसकी किताबें धीरे-धीरे गायब होने लगीं।

फिर आँगन से।

फिर घर से।

एक शाम वह मेरे पास आई।

उसने नई साड़ी पहन रखी थी।

वह बिल्कुल स्थिर खड़ी रही।

“मैं पढ़ना चाहती थी।”

उसने पानी में देखा।

“अब भी चाहती हूँ।”

उसकी उँगलियाँ सिक्के पर कस गईं।

“मुझे जाने दो।”

सिक्का गिर गया।

उसके बाद शादी की तैयारियाँ शुरू हो गईं।

चाय की दुकान पर भीम और सज्जन चुपचाप बैठे थे।

“तुम जा रहे हो?” भीम ने पूछा।

सज्जन ने सिर हिलाया।

“तुम?”

“ज़रूर।”

दोनों नहीं मुस्कुराए।

शादी के दिन दोनों गाँव के दूसरे जवानों के साथ दरवाज़े के पास खड़े थे।

उन्होंने कुर्सियाँ उठाईं।

पानी पहुँचाया।

जब पंडित से एक गलती हुई तो वे हँसे।

जब एकता विदा हुई, उसने दोनों में से किसी की ओर नहीं देखा।

कई साल बाद लोग कहते कि वह शहर चली गई थी।

कुछ कहते कि वह पढ़ रही थी।

कुछ कहते कि उसे काम मिल गया था।

किसी को ठीक-ठीक पता नहीं था।

सज्जन और भीम चाय की दुकान पर साथ बैठते रहे।

एक दोपहर भीम ने कहा,

“चाय?”

सज्जन ने सिर हिलाया।

“चाय।”

—

दीपक का मेरे पास आना धीरे-धीरे कम हो गया।

जब आता, उसकी इच्छाएँ भी धीरे-धीरे बदलने लगीं।

शुरुआत में वही शब्द होते।

“उसे सुरक्षित रखना।”

फिर:

“उसे खुश रखना।”

फिर:

“उसका पति अच्छा हो।”

कुछ समय बाद उसने आख़िरी बात कहना बंद कर दिया।

वह बस वहाँ खड़ा रहता।

एक शाम वह दो सिक्के लेकर आया।

काफ़ी देर तक उन्हें देखता रहा।

उसने एक सिक्का गिराया।

फिर दूसरा।

कुछ नहीं कहा।

घर पर गौरी रात के खाने के साथ उसका इंतज़ार कर रही थी।

“देर हो गई।”

“मुझे पता है।”

“खाना ठंडा हो गया है।”

“मैं खा लूँगा।”

उसने कटोरा उसकी ओर खिसका दिया।

वह बैठ गया।

उसने उसकी कमीज़ में एक फटा हुआ हिस्सा देखा।

“मुझे दो।”

“मैं ठीक कर दूँगा।”

“तुम नहीं करोगे।”

“करूँगा।”

“तुम भूल जाओगे।”

वह मुस्कुराया।

“तो मुझे याद दिला देना।”

उसने कमीज़ अपने हाथ में ले ली।

—

एक सर्द सुबह गौरी अकेली मेरे पास आई।

उसने वही पुरानी शॉल ओढ़ रखी थी, जो वह मंदिर जाते समय इस्तेमाल करती थी।

वह इधर-उधर देखकर मेरे पास आई।

वहाँ कोई नहीं था।

उसने दोनों हाथ पत्थर की मुंडेर पर रख दिए।

“क्या चंदन ठीक है?”

गाँव ने कभी उससे यह नाम नहीं सुना था।

दीपक ने भी नहीं।

उसने अपनी माँ के घर में भी कभी यह नाम नहीं लिया था।

केवल यहाँ।

वह इंतज़ार करती रही।

“क्या वह अब भी वहीं रहता है?”

एक सिक्का गिरा।

“क्या वह खुश है?”

दूसरा सिक्का।

उसने आँखें बंद कर लीं।

“कृपया उसे खुश रखना।”

वह सूरज के नीम के पेड़ की चोटी तक पहुँचने से पहले ही वहाँ से चली गई।

—

उस दोपहर चाय की दुकान पर दीपक सज्जन और भीम के साथ बैठा था।

तीनों फसल के बारे में बात कर रहे थे।

गौरी सब्ज़ियाँ लेकर वहाँ से गुज़री।

दीपक ने उसे देखा।

“घर जा रही हो?”

उसने सिर हिलाया।

“मैं आता हूँ।”

वह आगे बढ़ गई।

भीम मुस्कुराया।

“तुम्हारी पत्नी तुम्हारा इंतज़ार कर रही है।”

दीपक ने अपनी चाय उठाई।

“वह हमेशा करती है।”

उसकी आवाज़ में न झेंप थी, न कोई सफ़ाई।

—

कुछ सप्ताह बाद गौरी फिर मेरे पास आई।

“क्या वह ठीक है?”

उसने एक सिक्का गिराया।

“उसे खुश रखना।”

दूसरा सिक्का।

इस बार वह कुछ ज़्यादा देर तक वहीं रही।

जब वह घर लौटी, दीपक आँगन के टूटे हुए दरवाज़े की कुंडी ठीक कर रहा था।

“तुमने मुझे बताया क्यों नहीं?” उसने कहा।

“बस कुंडी ही तो थी।”

“तुम्हें चोट लग सकती थी।”

उसने उसकी ओर देखा।

“नहीं लगी।”

वह उसके पास खड़ी हो गई।

“हटो।”

“क्यों?”

“तुम इसे गलत कर रहे हो।”

वह हट गया।

उसने उसके हाथ से औज़ार लिया और कुंडी ठीक करने लगी।

वह उसे देखता रहा।

दोनों में से किसी ने कुछ नहीं कहा।

—

साल बीतते गए।

सड़क चौड़ी होती गई।

चाय की दुकान पर नई छत लग गई।

पुरानी बेंचों की जगह नई बेंचें आ गईं।

गाँव में दो मोटरसाइकिलें, तीन टेलीविज़न और मोबाइल फोन बेचने वाली एक दुकान आ गई।

कुआँ वहीं रहा जहाँ वह हमेशा से था।

सज्जन अब भी आता था।

भीम भी।

अब दोनों बूढ़े हो चले थे।

एक शाम सज्जन ने कहा,

“याद है जब तुम इंदौर जाने वाले थे?”

भीम हँसा।

“तुम ही तो मुझे भेजना चाहते थे।”

“मैंने ऐसा कभी नहीं कहा।”

“कहा था।”

“तुम्हें वहम हो रहा है।”

दोनों हँस पड़े।

दोनों ने कभी यह नहीं पूछा कि उस समय दूसरे ने क्या इच्छा माँगी थी।

वे अब भी साथ बैठते थे।

—

बकुल और नकुल अब कम आने लगे थे।

जब आते, साथ आते।

एक दोपहर वे मेरे पास खड़े थे।

“पूरब वाला खेत याद है?” बकुल ने पूछा।

नकुल हँसा।

“पश्चिम वाला याद है?”

दोनों ने एक-दूसरे को देखा।

फिर दोनों फिर हँस पड़े।

“चाय?” नकुल ने कहा।

“चाय।”

वे चाय की दुकान की ओर चल पड़े।

—

एकता एक बार वापस आई।

वह चाय की दुकान पर चश्मा लगाए खड़ी थी।

सज्जन लगभग उसे पहचान नहीं पाया।

भीम उसे देखता रह गया।

“तुम आई हो।”

“हाँ।”

“शहर से?”

“हाँ।”

“वहाँ क्या कर रही हो?”

“पढ़ रही हूँ।”

सज्जन मुस्कुराया।

“यह अच्छी बात है।”

उसने उसकी ओर देखा।

“क्या सच में?”

“हाँ।”

भीम ने उसे चाय का गिलास दिया।

“तुम अब भी कम चीनी लेती हो?”

वह चौंकी।

“तुम्हें याद है?”

उसने कंधे उचका दिए।

उसने चाय पी।

तीनों कुछ देर साथ बैठे।

किसी ने शादी का ज़िक्र नहीं किया।

किसी ने उन बीच के वर्षों का ज़िक्र नहीं किया।

जब वह जाने लगी, सज्जन और भीम उसे बस अड्डे की ओर जाते हुए देखते रहे।

“चाय?” भीम ने कहा।

सज्जन ने सिर हिलाया।

“चाय।”

—

दीपक और गौरी बिना ध्यान दिए बूढ़े होते गए।

कोई बड़ा बदलाव नहीं आया।

जब वे बाज़ार जाते, दीपक उसका इंतज़ार करने लगा।

गौरी उसके पसंद का खाना अलग रख देती।

जब वह देर से लौटता, वह दीया जलता छोड़ देती।

जब वह बीमार होती, वह खेतों पर जाना बंद कर देता।

जब एक सर्दी में उसकी खाँसी बढ़ गई, तो वह उसके पास तब तक बैठी रही, जब तक वह सो नहीं गया।

चाय की दुकान ने इन चीज़ों को देखा।

गाँव ने भी इनमें से कुछ चीज़ें देखीं।

लेकिन दीपक और गौरी ने कभी इनके बारे में बात नहीं की।

गौरी अब भी कभी-कभी मेरे पास आती थी।

लंबे समय तक उसके सिक्कों पर वही नाम रहता था।

फिर एक दिन वह आई और उस नाम को बोले बिना मेरे सामने खड़ी रही।

उसने सिक्का हाथ में पकड़ा।

उसके होंठ हिले।

पानी तक कोई आवाज़ नहीं पहुँची।

उसने सिक्का गिरा दिया।

—

अगली शाम दीपक मेरे पास आया।

वह बहुत देर तक खड़ा रहा।

सूरज खेतों के पीछे डूब रहा था।

उसने अपनी जेब से एक सिक्का निकाला।

“उसे सुरक्षित रखना।”

उसने सिक्का गिरा दिया।

फिर वह तब तक वहीं खड़ा रहा, जब तक पानी अँधेरा नहीं हो गया।

—

अगले सप्ताह दीपक और गौरी दोनों साथ मेरे पास आए।

दोनों ने इसकी योजना नहीं बनाई थी।

कम-से-कम दोनों में से किसी ने ऐसा कहा नहीं।

वे कुछ कदमों के फ़ासले पर रुक गए।

गौरी ने उसकी ओर देखा।

“तुम आए?”

“हाँ।”

उसने पानी की ओर देखा।

उसने गाँव की ओर देखा।

गौरी ने एक सिक्का निकाला।

दीपक ने भी।

दोनों चुपचाप खड़े रहे।

सबसे पहले दीपक आगे बढ़ा।

उसने सिक्का उँगलियों के बीच पकड़ रखा था।

“उसे सुरक्षित रखना।”

उसने सिक्का गिरा दिया।

गौरी मुंडेर के पास आई।

उसने पानी में देखा।

“उसे सुरक्षित रखना।”

उसका सिक्का भी गिर गया।

लहरें पुराने पत्थर से टकराईं और गायब हो गईं।

दोनों ने कुछ नहीं कहा।

वे गाँव की ओर वापस चल पड़े।

नीम के पेड़ के पास दीपक थोड़ा धीमा हो गया।

गौरी भी धीमी हो गई।

सामने की सड़क पर अँधेरा उतर रहा था।

वे एक-दूसरे के साथ-साथ चलते रहे।

उनके पीछे चाय की दुकान बंद हो रही थी।

और उनके आगे घरों में पहली रोशनियाँ जलने लगी थीं।

मैं वहीं रहा, जहाँ हमेशा से था।

पानी शांत हो गया।

और सड़क उन्हें घर की ओर ले गई।

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