फार्महाउस का एक सप्ताह



बारिश की पहली बूंद फार्महाउस की पुरानी लाल छत पर गिरी तो सरवेश ने कार की खिड़की से बाहर देखा।

सामने वही लोहे का जंग लगा फाटक था।

वही आम का पेड़।

वही पत्थर की सीढ़ियाँ।

और सीढ़ियों के ठीक ऊपर वह बरामदा, जहाँ कभी चार बच्चे शाम से रात तक बैठकर दुनिया बदलने की योजनाएँ बनाया करते थे।

बीस साल।

पूरे बीस साल बाद वे चारों वापस लौटे थे।

सरवेश ने गाड़ी बंद की।

पीछे से ऋषभ उतरा और हाथ फैलाकर बोला,

“भाई, ये फार्महाउस अभी तक खड़ा है, लेकिन हम चारों की कमर नहीं।”

निरजरा हँस पड़ी।

“तुम्हारी कमर की चिंता बाद में करेंगे। पहले ये बताओ कि चाबी किसके पास है?”

अंत में अपेक्षा ने अपने बैग से चाबी निकाली।

“मेरे पास।”

तीनों उसकी तरफ देखने लगे।

अपेक्षा मुस्कुराई।

“क्या? मैं अब भी सब संभालती हूँ।”

सरवेश ने धीरे से कहा,

“वही तो तुम्हारी सबसे बड़ी समस्या है।”

अपेक्षा ने उसे देखा।

“क्या?”

“कुछ नहीं।”

ऋषभ ने तुरंत बात बदल दी।

“चलो, अंदर। वरना बीस साल बाद मिले हैं और पहला झगड़ा यहीं शुरू हो जाएगा।”

चारों हँस पड़े।

लेकिन किसी ने नहीं देखा कि उस हँसी के पीछे चार अलग अलग जिंदगियाँ कितनी थकी हुई थीं।

पहला दिन

फार्महाउस वैसा ही था।

दीवारों पर पुरानी तस्वीरें थीं। लकड़ी की अलमारियाँ थीं। बरामदे में वही झूला था। पीछे तालाब, जिसके किनारे वे चारों कभी घंटों बैठे रहते थे।

निरजरा ने एक तस्वीर उठाई।

चार बच्चे।

सरवेश, ऋषभ, निरजरा और अपेक्षा।

नंगे पैर।

कीचड़ से सने कपड़े।

और आँखों में ऐसी बेफिक्री, जो बड़े होने के बाद कहीं नहीं मिलती।

“हम कितने बेवकूफ थे,” ऋषभ ने कहा।

“नहीं,” अपेक्षा बोली, “हम आज ज्यादा बेवकूफ हैं।”

तीनों उसकी तरफ देखने लगे।

वह मुस्कुरा रही थी।

लेकिन उसकी आँखें नहीं।

रात को खाना खाने के बाद सरवेश का फोन बजा।

स्क्रीन पर नाम था, विभा।

सरवेश तुरंत सीधा होकर बैठ गया।

“हाँ।”

कुछ देर वह सुनता रहा।

“जी।”

फिर बोला,

“नहीं, मैंने कुछ नहीं कहा।”

दूसरी तरफ से कुछ कहा गया।

“ठीक है।”

फोन कट गया।

ऋषभ ने उसकी तरफ देखा।

“क्या हुआ?”

“कुछ नहीं।”

“भाभी ने डाँटा?”

सरवेश ने मुस्कुराने की कोशिश की।

“तुम लोग भी न।”

निरजरा ने पूछा,

“तान्या कैसी है?”

सरवेश की मुस्कान गायब हो गई।

“उसे अगले महीने छात्रावास भेज रहे हैं।”

कुछ पल के लिए कमरे में सन्नाटा छा गया।

अपेक्षा ने धीरे से पूछा,

“इतनी दूर?”

“हाँ।”

“क्यों?”

सरवेश ने पानी का गिलास उठाया।

“विभा कहती है कि तान्या बिगड़ रही है। पढ़ाई पर ध्यान नहीं देती। फोन चलाती है। जवाब देती है। उसे अनुशासन चाहिए।”

“और तुम?”

सरवेश ने पहली बार उनकी आँखों में देखा।

“मैं चाहता हूँ कि वो मेरे पास रहे।”

बस इतना कहकर वह चुप हो गया।

ऋषभ ने पूछा,

“तो बोलते क्यों नहीं?”

सरवेश हँसा।

बहुत हल्की, बहुत थकी हुई हँसी।

“क्योंकि कुछ घरों में पति की आवाज़ सिर्फ हाँ कहने के लिए होती है।”

कोई नहीं हँसा।

दूसरा दिन

सुबह चारों तालाब के पास गए।

वहीं जहाँ बीस साल पहले उन्होंने घंटों बैठकर अपने भविष्य के बारे में बातें की थीं।

ऋषभ ने मिट्टी कुरेदते हुए कहा,

“याद है? हम कहते थे कि बड़े होकर कभी झूठ नहीं बोलेंगे।”

निरजरा ने कहा,

“बच्चे बहुत कुछ कहते हैं।”

“और बड़े?”

“बड़े उससे भी ज्यादा झूठ बोलते हैं।”

ऋषभ ने उसकी तरफ देखा।

निरजरा ने नजरें फेर लीं।

उसका हाथ अनायास पेट पर चला गया।

बहुत हल्के से।

जैसे किसी राज को छूकर देख रही हो।

उसके अंदर एक जिंदगी थी।

तीन महीने की।

लेकिन यह बात उसके अलावा किसी को नहीं पता थी।

न उसके पति हर्ष को।

न उसके इन सबसे करीबी दोस्तों को।

किसी को नहीं।

क्योंकि निरजरा को डर था।

उसे हमेशा से अपने शरीर से नफरत करना सिखाया गया था।

विद्यालय में।

रिश्तेदारों ने।

सहेलियों ने।

यहाँ तक कि कभी कभी आईने ने भी।

हर्ष उससे प्रेम करता था।

वह जानती थी।

बहुत प्रेम करता था।

लेकिन निरजरा के भीतर एक आवाज हमेशा कहती थी,

“जब तक तुम सफल हो, सुंदर हो, अपने पैरों पर खड़ी हो, तभी तक कोई तुम्हें चुनेगा।”

गर्भावस्था उसके लिए खुशी के साथ साथ डर भी थी।

अगर उसका शरीर बदल गया तो?

अगर उसका काम रुक गया तो?

अगर वह सफल न रही तो?

अगर हर्ष की नजर में भी उसकी कीमत कम हो गई तो?

उसने पेट पर हाथ रखा।

“मैं तुम्हें खोना नहीं चाहती,” उसने मन में कहा।

“लेकिन खुद को भी नहीं।”

तीसरा दिन

ऋषभ सुबह से अपने काम में लगा हुआ था।

एक सूचना प्रौद्योगिकी कंपनी में उसकी नौकरी अच्छी थी।

लेकिन उसका पद और भविष्य उसके लिए उससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण हो गया था।

उसकी अधिकारी उससे नौ साल बड़ी थी।

मीरा ने कुछ महीने पहले ऋषभ से अपने प्रेम का इजहार किया था।

और ऋषभ ने हाँ कह दी थी।

सिर्फ इसलिए नहीं कि उसे मीरा पसंद थी।

बल्कि इसलिए कि मीरा उसके काम और भविष्य को कई गुना आगे ले जा सकती थी।

ऋषभ जानता था कि वह क्या कर रहा है।

और शायद यही बात उसे खुद से नजरें मिलाने नहीं देती थी।

लेकिन समस्या यह थी कि चार साल से उसके दिल में कोई और था।

प्रेरणा।

उसकी पड़ोसन।

उसकी सबसे अच्छी मित्र।

वह लड़की जिसके साथ वह रात के दो बजे भी चाय पी सकता था।

जिसके सामने वह अपने काम की परेशानियाँ, अपने डर और अपनी असफलताएँ सब कह सकता था।

और जिसे उसने कभी नहीं बताया कि वह उससे प्रेम करता है।

क्योंकि दोनों ने अपने रिश्ते को एक नाम दे रखा था।

मित्रता।

कभी कभी इंसान सच को स्वीकार करने से ज्यादा आसान उसे एक सुविधाजनक नाम दे देना समझता है।

दोपहर को प्रेरणा का फोन आया।

“फार्महाउस पहुँच गए?”

“हाँ।”

“अच्छा है।”

कुछ पल दोनों चुप रहे।

फिर ऋषभ ने कहा,

“तुम आतीं तो अच्छा लगता।”

फोन के दूसरी तरफ कुछ सेकंड चुप्पी रही।

“तुम्हारी प्रेमिका क्या कहती?”

ऋषभ चुप हो गया।

प्रेरणा ने हँसकर कहा,

“मजाक कर रही हूँ।”

ऋषभ ने पहली बार महसूस किया कि शायद मजाक कभी कभी सच की सबसे सुरक्षित शक्ल होता है।

“प्रेरणा।”

“हाँ?”

“अगर कोई आदमी अपनी जिंदगी का बहुत बड़ा फैसला सिर्फ इसलिए करे क्योंकि उससे उसका भविष्य बेहतर हो सकता है, तो क्या वो बुरा इंसान है?”

प्रेरणा ने जवाब देने में वक्त लिया।

“बुरा?”

“हाँ।”

“शायद नहीं।”

“तो?”

“लेकिन अगर वो उस फैसले से किसी ऐसे इंसान को अपने साथ बाँध ले, जिससे वो सच में प्रेम नहीं करता, तो शायद वो डरपोक है।”

ऋषभ की साँस अटक गई।

“तुम्हें कैसे पता?”

“क्योंकि मैं तुम्हें चार साल से जानती हूँ।”

फोन कट गया।

ऋषभ देर तक मोबाइल देखता रहा।

चौथा दिन

उस रात बारिश हुई।

चारों बरामदे में बैठे थे।

बिजली चली गई।

मोमबत्ती जलाई गई।

अचानक ऋषभ बोला,

“चलो एक खेल खेलते हैं।”

“क्या?”

“एक एक करके बताओ कि हममें से कौन अपनी जिंदगी से सबसे ज्यादा खुश है।”

अपेक्षा हँसी।

“बचपन में भी तुम घटिया खेल खिलाते थे।”

“पहले तुम।”

अपेक्षा चुप हो गई।

उसने तीनों को देखा।

फिर बोली,

“मैं।”

तीनों चौंक गए।

“सच?”

“हाँ।”

“क्यों?”

अपेक्षा ने धीरे से कहा,

“क्योंकि मेरे पास सब कुछ है।”

उसने अपना फोन उठाया।

उसमें उसके दोनों बेटे थे।

नैतिक।

सात्विक।

उनकी तस्वीरें।

उनकी हँसी।

उनकी विद्यालय की पोशाकें।

उनके जन्मदिन।

उसकी दुनिया।

लेकिन एक तस्वीर पर उसकी उंगली रुक गई।

वह उसके पति की तस्वीर थी।

उसके साथ एक दूसरी महिला थी।

बहुत करीब।

बहुत सहज।

अपेक्षा ने फोन बंद कर दिया।

उसने कभी किसी को नहीं बताया था कि उसके पति ने उसे धोखा दिया है।

क्योंकि उसे डर था कि अगर उसने सच बोल दिया तो उसके बच्चों का संसार टूट जाएगा।

और वह अपने बच्चों के लिए कुछ भी सह सकती थी।

लेकिन पिछले कुछ महीनों से एक सवाल उसे भीतर से खा रहा था।

क्या बच्चों को बचाने के नाम पर माँ का अपना जीवन खत्म कर देना भी जरूरी है?

उसने मोमबत्ती की लौ को देखा।

“कभी कभी,” उसने कहा, “हम जिस घर को बचाते रहते हैं, उसमें हम खुद रहना भूल जाते हैं।”

सरवेश ने उसकी तरफ देखा।

निरजरा ने भी।

ऋषभ ने पहली बार मजाक नहीं किया।

पाँचवाँ दिन

अगली सुबह सरवेश ने पहली बार विभा को फोन किया।

“मुझे तान्या से बात करनी है।”

“अभी?”

“हाँ।”

“वो पढ़ रही है।”

“विभा।”

उसकी आवाज में पहली बार ठहराव था।

“मैं उससे बात करना चाहता हूँ।”

दूसरी तरफ कुछ सेकंड चुप्पी रही।

फिर तान्या की आवाज आई।

“पापा?”

सरवेश की आँखें भर आईं।

“हाँ बेटा।”

“आप कब आ रहे हो?”

“जल्दी।”

“मुझे छात्रावास नहीं जाना।”

सरवेश ने आँखें बंद कर लीं।

“तुम क्या चाहती हो?”

“मैं आपके साथ रहना चाहती हूँ।”

इतना सुनना था कि सरवेश के भीतर बीस साल से दबा हुआ पिता जाग गया।

“ठीक है।”

“क्या?”

“पहले हम दोनों मिलकर बात करेंगे।”

“मम्मी से?”

“हाँ।”

“और अगर मम्मी नहीं मानी?”

सरवेश कुछ पल चुप रहा।

फिर बोला,

“तो इस बार पापा अपनी बात रखेंगे।”

उधर ऋषभ ने मीरा को फोन किया।

“मुझे आपसे मिलना है।”

“फार्महाउस से लौटकर?”

“नहीं। आज।”

मीरा ने शायद उसकी आवाज में कुछ पहचान लिया।

“सब ठीक है?”

“नहीं।”

उसने पहली बार सच बोलने की कोशिश की।

“मैंने आपसे हाँ इसलिए कहा था क्योंकि मुझे अपने भविष्य का डर था।”

दूसरी तरफ बहुत लंबी चुप्पी थी।

ऋषभ ने आगे कहा,

“आप मेरे लिए सम्मान की बात हैं। लेकिन मैं आपसे प्रेम नहीं करता।”

मीरा ने बहुत देर बाद कहा,

“मुझे पहले से पता था कि शायद तुम मुझसे प्रेम नहीं करते।”

ऋषभ चौंका।

“फिर आपने?”

“क्योंकि मैं चाहती थी कि एक दिन तुम खुद से झूठ बोलना बंद करो।”

फोन कट गया।

ऋषभ बरामदे में बैठा रहा।

उसके हाथ काँप रहे थे।

लेकिन कई वर्षों बाद उसकी साँस हल्की लग रही थी।

उसने मोबाइल उठाया।

प्रेरणा का नंबर खोला।

फिर बंद कर दिया।

कुछ बातें फोन पर नहीं कही जातीं।

छठा दिन

निरजरा सुबह तालाब के पास अकेली बैठी थी।

अपेक्षा उसके पास आकर बैठ गई।

“कब से जानती हो?”

निरजरा का चेहरा सफेद पड़ गया।

“क्या?”

“कि तुम गर्भवती हो।”

निरजरा की आँखें भर आईं।

“तुम्हें कैसे पता?”

“तुम्हारे चेहरे से।”

कुछ देर दोनों चुप रहीं।

फिर निरजरा टूट गई।

“मुझे डर लगता है।”

“किससे?”

“सबसे।”

“हर्ष से?”

“नहीं।”

“फिर?”

“खुद से।”

उसने रोते हुए कहा,

“अगर मैं पहले जैसी नहीं रही तो? अगर मेरा शरीर बदल गया तो? अगर मैं काम में पीछे रह गई तो? अगर हर्ष को मुझसे कम प्रेम होने लगा तो?”

अपेक्षा ने उसका हाथ पकड़ लिया।

“निरजरा, तुम्हें पता है तुम्हारी सबसे बड़ी गलती क्या है?”

“क्या?”

“तुमने अपने पति को छोड़कर पूरी दुनिया की राय पर विश्वास कर लिया।”

निरजरा चुप रही।

अपेक्षा ने कहा,

“हर्ष को सच जानने का अधिकार है। तुम्हें फैसला लेने का अधिकार है। लेकिन डर को तुम्हारी जगह फैसला लेने का अधिकार नहीं है।”

निरजरा ने पहली बार पेट पर हाथ रखते हुए मुस्कुराया।

“मैं उसे आज बताऊँगी।”

सातवाँ दिन

उस शाम चारों फार्महाउस के बाहर खड़े थे।

बारिश रुक चुकी थी।

आसमान साफ था।

बीस साल पहले वे इसी जगह से अलग हुए थे।

और अब फिर अलग होने वाले थे।

लेकिन इस बार वे वही लोग नहीं थे।

सरवेश ने कहा,

“हमने बचपन में कहा था कि डरकर फैसला नहीं करेंगे।”

ऋषभ हँसा।

“और हमने बीस साल में वही सबसे ज्यादा किया।”

निरजरा ने कहा,

“शायद बड़े होने का मतलब यह नहीं कि डर खत्म हो जाए।”

अपेक्षा ने उसकी बात पूरी की।

“शायद बड़े होने का मतलब है कि डर के बावजूद सच चुनना सीखो।”

चारों कुछ देर चुप रहे।

फिर ऋषभ ने पूछा,

“अगली बार कब आएँगे?”

सरवेश ने फार्महाउस की तरफ देखा।

“बीस साल बाद नहीं।”

निरजरा हँसी।

“एक साल?”

“नहीं।”

अपेक्षा बोली,

“हर साल।”

ऋषभ ने हाथ आगे बढ़ाया।

एक एक करके चारों ने हाथ उसके ऊपर रख दिए।

बीस साल पहले चार बच्चों ने वहाँ एक वादा किया था।

आज चार बड़े लोगों ने उसे फिर से दोहराया।

कुछ महीनों बाद तान्या छात्रावास नहीं गई।

सरवेश ने पहली बार अपने विवाह में अपनी बात रखी।

विभा नाराज हुई।

बहुत नाराज।

लेकिन पहली बार दोनों ने अपने रिश्ते को पति पत्नी की तरह नहीं, बल्कि दो माता पिता की तरह बैठकर देखा।

तान्या उनके बीच की लड़ाई नहीं बनी।

उनकी बातचीत की वजह बनी।

ऋषभ ने अपनी नौकरी नहीं छोड़ी।

लेकिन उसने अपने भविष्य के लिए प्रेम का सौदा करना बंद कर दिया।

कुछ महीनों बाद वह प्रेरणा के दरवाजे पर खड़ा था।

हाथ में फूल नहीं थे।

कोई फिल्मी संवाद नहीं था।

सिर्फ एक सच था।

“प्रेरणा, मैं तुमसे चार साल से प्रेम करता हूँ।”

प्रेरणा ने उसे कुछ पल देखा।

फिर पूछा,

“इतनी देर क्यों लगाई?”

ऋषभ मुस्कुरा दिया।

“डर गया था।”

“अब?”

“अब भी डर रहा हूँ।”

प्रेरणा हँस पड़ी।

“तो शायद इस बार तुम सच बोल रहे हो।”

निरजरा ने हर्ष को सब बता दिया।

हर्ष बहुत देर तक चुप रहा।

फिर उसने उसका हाथ पकड़ लिया।

“तुम्हें लगा मैं तुम्हें तुम्हारे शरीर की वजह से प्यार करता हूँ?”

निरजरा रोते हुए बोली,

“मुझे खुद पर भरोसा नहीं था।”

हर्ष ने उसके पेट पर हाथ रखा।

“तो अब तीन लोगों पर भरोसा करना सीखो।”

“तीन?”

“तुम, मैं और ये।”

निरजरा हँसते हँसते रो पड़ी।

अपेक्षा ने अपने पति को उसी रात घर से निकालने का फैसला नहीं किया।

उसने पहले अपने बच्चों से बात की।

फिर अपने पति से।

फिर खुद से।

उसने अपने विवाह का फैसला किसी और की राय से नहीं किया।

उसने अपने बेटों को यह भी नहीं सिखाया कि परिवार बचाने के लिए किसी को अपना आत्मसम्मान कुर्बान करना चाहिए।

उसने उन्हें एक और बात सिखाई।

सच्चा परिवार वह नहीं जिसमें कोई कभी गलती न करे।

सच्चा परिवार वह है जिसमें सच बोलने की जगह बची रहे।

एक साल बाद चारों फिर फार्महाउस में मिले।

इस बार उनके साथ बच्चे भी थे।

तान्या तालाब के किनारे दौड़ रही थी।

ऋषभ और प्रेरणा साथ बैठे थे।

निरजरा अपने छोटे से बच्चे को गोद में लिए हँस रही थी।

अपेक्षा के बेटे नैतिक और सात्विक आम के पेड़ पर चढ़ने की कोशिश कर रहे थे।

सरवेश ने पुराने संदूक को देखा।

फिर फार्महाउस की दीवार पर लगी चारों की बचपन की तस्वीर को।

ऋषभ ने पूछा,

“क्या देख रहे हो?”

सरवेश मुस्कुराया।

“बस सोच रहा हूँ, हम कितने छोटे थे।”

“और अब?”

सरवेश ने अपने आसपास देखा।

“अब बड़े हो गए हैं।”

ऋषभ ने हँसकर कहा,

“सच में?”

सरवेश ने कुछ पल सोचा।

फिर बोला,

“शायद अब समझ में आया है कि बड़ा होना क्या होता है।”

बरामदे के बाहर शाम उतर रही थी।

बीस साल पहले जिन चार बच्चों ने यहाँ बैठकर अपने भविष्य के सपने देखे थे, वे अपने भविष्य को समझ नहीं पाए थे।

लेकिन उस एक हफ्ते ने उन्हें एक बात जरूर सिखा दी थी।

जिंदगी में सबसे मुश्किल फैसले अक्सर वही होते हैं जिनमें किसी और को नहीं, खुद को जवाब देना पड़ता है।

और शायद बचपन कभी पूरी तरह खत्म नहीं होता।

वह बस कहीं भीतर बैठकर इंतजार करता है कि एक दिन हम लौटें, उससे मिलें और उससे पूछें,

“क्या मैं अब भी वही हूँ, जो तुम बनना चाहते थे?”

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