अड़तीस की उम्र में साहिल को यह एहसास होने लगा था कि उसकी ज़िंदगी का फैसला तब ही कर दिया गया था, जब वह इतना बड़ा भी नहीं हुआ था कि समझ सके कि फैसला आखिर होता क्या है।
वह बनारस में एक पुराने, विशाल घर में रहता था। ऐसा लगता था कि वह घर आराम के लिए कम और लोगों को समायोजित करने के लिए ज़्यादा बनाया गया था।
उसके माता-पिता भूतल पर रहते थे। चाचा-चाची ऊपर के कमरों में रहते थे। दो चचेरे भाइयों की शादी हो चुकी थी और वे भी उसी घर में रह रहे थे, क्योंकि उनके परिवार में हमेशा से ऐसा ही होता आया था।
घर में हर तरफ बच्चे थे—गलियारों में दौड़ते हुए, खिलौनों के लिए लड़ते हुए, मिठाइयों की ज़िद करते हुए, और हर पंद्रह मिनट में किसी न किसी नए कारण से रोते हुए।
और फिर उसकी पत्नी थी।
उसकी पत्नी लगभग हर चीज़ में कोई न कोई कमी ढूँढ़ लेती थी।
चाय बहुत ठंडी थी।
बच्चों में अनुशासन नहीं था।
उसकी माँ ने दखल दिया था।
चाचा ने दुकान से ज़रूरत से ज़्यादा माल ले लिया था।
चचेरे भाई ने पैसे वापस नहीं किए थे।
साहिल की सुबहें पारिवारिक साड़ी के कारोबार में बीतती थीं, दोपहरें सप्लायरों से सौदेबाज़ी करते हुए और शामें उन बहसों को सुनते हुए, जो मानो बीस साल से बिना रुके चल रही थीं।
वही दुकान।
वही घर।
वही लोग।
वही समस्याएँ।
कभी-कभी महँगी बनारसी साड़ियों को सफेद रोशनी वाली दुकान में ग्राहकों को खोलकर देखते हुए, काउंटर के पीछे बैठे साहिल को ख्याल आता कि अगर सत्रह साल पहले उसने बस “हाँ” कह दिया होता, तो क्या होता।
तब वह इक्कीस साल का था।
मुंबई की एक बहुराष्ट्रीय कंपनी ने उसे नौकरी की पेशकश की थी।
उसे वह एक रास्ता लगा था—बाहर निकलने का रास्ता।
मुंबई।
एक अपार्टमेंट।
एक ऑफिस।
एक तनख्वाह।
आज़ादी।
और शायद, आगे चलकर, कोई दूसरा देश।
वह कल्पना करता था कि वह समुद्र पार उड़ रहा है, शीशे की इमारतों में काम कर रहा है, कागज़ के कप में कॉफी पीते हुए ऐसी इमारतों की क्षितिज-रेखा देख रहा है, जिनका बनारस से कोई लेना-देना नहीं है।
शायद वह अपनी किसी सहकर्मी से शादी करता।
किसी आधुनिक लड़की से।
किसी ऐसी लड़की से जो कॉर्पोरेट जीवन को समझती हो।
किसी ऐसी लड़की से जिसे उसने खुद चुना हो।
शायद वे DINKs बनकर रहते—दो कमाने वाले, बच्चे नहीं, महँगी छुट्टियाँ और शांत सप्ताहांत।
लेकिन उसने रुकने का फैसला किया।
उसके माता-पिता खुश हुए थे।
उसके दादा-दादी ने राहत की साँस ली थी।
एक उपयुक्त लड़की ढूँढ़ ली गई।
उनकी शादी हो गई।
बच्चे हुए।
साड़ी का कारोबार उसकी जिम्मेदारी बन गया।
और सत्रह साल बीत गए।
एक शाम, रेशमी साड़ियों की एक खेप को लेकर हुई बेहद मामूली बहस और फिर घर में बेटे के स्कूल प्रोजेक्ट को लेकर हुई उससे भी मामूली बहस के बाद साहिल घर से बाहर निकल गया।
उसकी पत्नी ने पीछे से आवाज़ लगाई।
“कहाँ जा रहे हो?”
“बस बाहर।”
“कितनी देर के लिए?”
“पता नहीं।”
“कम-से-कम मुझे बता तो—”
लेकिन साहिल दरवाज़ा बंद कर चुका था।
उसने कार निकाली।
वह चलाता रहा।
उसे खुद नहीं पता था कि वह कहाँ जा रहा है।
करीब एक घंटे तक वह बनारस के बाहरी इलाकों में गाड़ी चलाता रहा—पहचानी हुई सड़कों से, अनजान गाँवों से और अँधेरे के उन हिस्सों से होकर, जहाँ धीरे-धीरे शहर पीछे छूटता जा रहा था।
आखिरकार वह ऐसी जगह पहुँच गया, जिसे वह पहचानता नहीं था।
एक चौराहा।
वहाँ चार सड़कें मिलती थीं।
कोई संकेत-पट्ट नहीं था।
कोई दुकान नहीं।
आसपास कोई घर नहीं।
बस कुछ पेड़, बिजली का एक पुराना खंभा और कोने में एक बंद पड़ा ढाबा।
ढाबा शायद कई वर्षों से बंद था।
उसकी छत आधी ढह चुकी थी।
फीके पड़ चुके बोर्ड पर अब कुछ पढ़ा नहीं जा सकता था।
लेकिन लकड़ी की बेंचें अभी भी वहाँ थीं।
साहिल ने कार खड़ी की।
उसने सिगरेट निकाली।
एक बेंच पर बैठ गया।
उस दिन पहली बार कोई उससे कुछ नहीं माँग रहा था।
उसने धीरे-धीरे सिगरेट पी।
तभी उसे एक कार की आवाज़ सुनाई दी।
एक बड़ी काली BMW किसी एक सड़क से निकलकर ढाबे के पास आकर रुकी।
करीब चालीस साल का एक आदमी बाहर निकला।
महँगी कमीज़।
महँगी घड़ी।
महँते जूते।
लेकिन चेहरा थका हुआ था।
उसने साहिल की ओर देखा।
“मैं यहाँ बैठ सकता हूँ?”
साहिल ने सिर हिला दिया।
वह आदमी उसके पास बैठ गया और सिगरेट जला ली।
कुछ देर दोनों चुप रहे।
फिर BMW वाला आदमी गहरी साँस लेकर बोला,
“कभी-कभी सोचता हूँ कि मैंने अपनी ज़िंदगी के साथ आखिर किया क्या।”
साहिल ने उसकी ओर देखा।
वह कुछ कह पाता, उससे पहले एक और गाड़ी दिखाई दी।
एक पुरानी Alto सामने वाली सड़क से आई।
वह रुकी।
साहिल की उम्र के आसपास का एक आदमी बाहर निकला।
कपड़े साधारण थे।
चेहरा अपनी उम्र से अधिक बूढ़ा लग रहा था।
वह बेंच की ओर आया।
“मैं यहाँ बैठ सकता हूँ?”
तीनों ने एक-दूसरे को देखा।
BMW वाला थोड़ा खिसक गया।
Alto वाला बैठ गया।
किसी ने इस अजीब संयोग पर हँसने की कोशिश नहीं की।
तीन अजनबी।
तीन गाड़ियाँ।
एक बंद पड़ा ढाबा।
एक चौराहा।
और तीन ऐसे आदमी, जो ऐसा लग रहे थे जैसे अपने साथ अदृश्य सामान ढोकर यहाँ पहुँचे हों।
फिर चौथा आदमी आया।
दूर से एक मोटरसाइकिल दिखाई दी।
वह चौराहे पर आकर धीमी हुई और रुक गई।
सवार मुश्किल से बाईस साल का था।
उसने हेलमेट उतारा।
इधर-उधर अनिश्चितता से देखा।
फिर उसकी नज़र उन तीन आदमियों पर पड़ी।
वह उनके पास आया।
“क्या यह सड़क बनारस की तरफ जाती है?”
साहिल ने इशारा किया।
“वह वाली।”
लड़के ने सिर हिलाया।
लेकिन वह गया नहीं।
बल्कि बेंच के किनारे बैठ गया।
BMW वाले आदमी ने उसे गौर से देखा।
“क्या हुआ?”
“कुछ नहीं।”
“चेहरा बता रहा है कि कुछ हुआ है।”
लड़का हल्का-सा मुस्कुराया।
“मुझे नौकरी मिली है।”
तीनों आदमी उसे देखने लगे।
“इसीलिए परेशान हो?” Alto वाला बोला।
लड़का हँस पड़ा।
“जानता हूँ, सुनने में बेवकूफी लगती है।”
“कहाँ की नौकरी है?”
“बेंगलुरु। MNC। अच्छी सैलरी। अच्छा करियर। सब कुछ।”
“फिर जश्न क्यों नहीं मना रहे?” साहिल ने पूछा।
लड़के ने सड़क की तरफ देखा।
“मेरे परिवार की मिठाई की दुकान है।”
Alto वाला धीरे से सिर हिलाने लगा।
“मेरे पिता चाहते हैं कि मैं दुकान संभालूँ।”
“और तुम क्या चाहते हो?”
“मुझे नहीं पता।”
साहिल ने उसकी ओर देखा।
“तुम्हारी उम्र कितनी है?”
“बाईस।”
साहिल लगभग हँस पड़ा।
“बाईस साल की उम्र में किसी को पता नहीं होना चाहिए।”
लड़के ने उसकी तरफ देखा।
साहिल ने सिगरेट की राख झाड़ी।
“जब मुझे मौका मिला था, तब मैं इक्कीस साल का था।”
बाकी दोनों आदमी ध्यान से सुनने लगे।
साहिल ने आगे कहा,
“मेरी भी यही स्थिति थी। परिवार का कारोबार। माता-पिता। उम्मीदें। मुझे मुंबई से नौकरी का ऑफर मिला था। मैं जा सकता था।”
“और?”
“नहीं गया।”
लड़का इंतज़ार करता रहा।
साहिल ने एक और कश लिया।
“मैं रुक गया।”
“क्यों?”
“परिवार।”
शब्द उसके मुँह से अपेक्षा से अधिक कड़वाहट के साथ निकला।
उसने सिगरेट की ओर देखा।
“शुरू में सही लगा। फिर शादी हुई। बच्चे हुए। कारोबार। जिम्मेदारियाँ। एक साल पाँच हो गए। पाँच दस हो गए। दस सत्रह हो गए।”
वह हल्का-सा हँसा।
“अब कभी-कभी सोचता हूँ कि मेरी ज़िंदगी कैसी होती।”
लड़के ने पूछा,
“क्या आपको पछतावा है?”
साहिल ने तुरंत जवाब नहीं दिया।
आखिर में उसने कहा,
“कभी-कभी।”
लड़का थोड़ा घबरा गया।
साहिल ने यह देखा।
वह आगे झुका।
“अगर जाना चाहते हो, तो चले जाओ।”
Alto वाला अचानक सिर हिलाने लगा।
“नहीं।”
साहिल ने उसकी ओर देखा।
उस आदमी ने अपने हाथ आपस में रगड़े।
“मैंने ठीक यही किया था।”
BMW वाला भी उसकी ओर देखने लगा।
Alto वाला आगे बोला,
“मेरे परिवार का भी कारोबार था। मैं दिल्ली चला गया। मुझे लगा कि मैं बहुत बड़ा आदमी बनूँगा।”
वह बिना हँसी के मुस्कुराया।
“नहीं बन पाया।”
वह सड़क की ओर देखता रहा।
“दस साल किसी तरह गुज़ारे। नौकरियाँ आती-जाती रहीं। फिर मंदी आई। मेरी नौकरी चली गई। तब तक दोबारा शुरुआत करने के लिए मैं बहुत बड़ा हो चुका था और वापस लौटने में बहुत शर्म आती थी।”
लड़के ने पूछा,
“दुकान का क्या हुआ?”
“मेरे दादा चल बसे। कारोबार गिरता गया। मेरे पिता अकेले संभाल नहीं पाए। उसे संभालने वाला कोई नहीं था।”
वह रुका।
“आखिरकार मेरे माता-पिता ने उसे बेच दिया।”
लड़का हैरान रह गया।
“उन्होंने पारिवारिक कारोबार बेच दिया?”
“बेचना पड़ा।”
Alto वाले की आवाज़ धीमी हो गई।
“उन्होंने पैसा निवेश कर दिया और तय किया कि बाकी ज़िंदगी उसी से गुज़ारेंगे।”
“और आप?”
“मैं वापस आ गया।”
वह हँसा।
“अब मैं उसी तरह की एक दुकान में कर्मचारी हूँ, जो कभी हमारी हुआ करती थी।”
कोई कुछ नहीं बोला।
लड़के ने साहिल की ओर देखा।
साहिल ने BMW की ओर देखा।
“कम-से-कम ये सफल तो हुआ,” साहिल ने कहा।
BMW वाला मुस्कुराया।
“हाँ।”
उसने दूसरी सिगरेट निकाली।
“मैं सफल हुआ।”
उसकी आवाज़ में कोई गर्व नहीं था।
“मैं सीढ़ियाँ चढ़ता गया। विदेश में पोस्टिंग। प्रमोशन। पैसा। अपार्टमेंट। होटल। बिज़नेस क्लास।”
उसने लड़के की ओर देखा।
“मैंने उस लड़की से शादी की जिसे मैं चाहता था।”
साहिल ने भौंह उठाई।
“ऑफिस की सबसे खूबसूरत लड़की,” उस आदमी ने हल्की मुस्कान के साथ कहा। “मेरे माता-पिता इस शादी के खिलाफ थे। मुझे परवाह नहीं थी।”
“और?”
“हम DINKs बन गए।”
उसने अपनी BMW की ओर देखा।
“दो कमाने वाले। बच्चे नहीं। हमने यात्राएँ कीं। चीज़ें खरीदीं। हमें लगा कि हमने ज़िंदगी को समझ लिया है।”
वह रुक गया।
फिर बोला,
“उसने मुझे तलाक दे दिया।”
लड़के ने नज़रें फेर लीं।
वह आदमी आगे बोला,
“हमारी शादी पाँच साल से खत्म हो चुकी थी।”
“फिर आपने रिश्ता खत्म क्यों नहीं किया?” साहिल ने पूछा।
“डर।”
जवाब तुरंत आया।
“यह स्वीकार करने का डर कि मैंने जो कुछ बनाया था, वह वैसा नहीं था जैसा मैंने सोचा था।”
उसने लंबा कश लिया।
“बच्चे नहीं थे। कोई साझा जिम्मेदारी नहीं थी जो हमें जोड़े रखती। आदत के अलावा कुछ नहीं था।”
उसने चौराहे के पार अँधेरे की ओर देखा।
“आखिरकार वह चली गई।”
“और अब?”
“मैं वापस आ गया।”
“अपने माता-पिता के पास?”
“हाँ।”
वह हँसा।
“उनके पास शिकायतों की कोई कमी नहीं है।”
उसने सिर हिलाया।
“मुझे लगा था कि मैं घर लौटूँगा और सब कुछ मेरा इंतज़ार कर रहा होगा।”
उसकी आवाज़ धीमी हो गई।
“लेकिन समय किसी का इंतज़ार नहीं करता।”
वह अँधेरे में देखता रहा।
“मेरे माता-पिता बूढ़े हो चुके हैं। मेरे भाई-बहनों के अपने परिवार हैं। जिन लोगों को मैं बीस साल पहले जानता था, वे अब वैसे लोग नहीं हैं।”
उसने साहिल की ओर देखा।
“मैं अपना परिवार ढूँढ़ते हुए वापस आया था।”
एक विराम।
“वे मौजूद हैं।”
एक और विराम।
“लेकिन अब मैं उनका हिस्सा नहीं हूँ।”
कोई नहीं बोला।
लड़का एक आदमी से दूसरे आदमी की ओर देखता रहा।
तीन रास्ते।
तीन ज़िंदगियाँ।
तीन अलग-अलग जवाब।
और किसी के पास भी ऐसा जवाब नहीं था जिसे अंतिम कहा जा सके।
कुछ देर बाद Alto वाला खड़ा हुआ।
“मुझे चलना चाहिए।”
BMW वाला भी खड़ा हो गया।
“मुझे भी।”
वे अपनी-अपनी गाड़ियों की ओर बढ़े।
Alto वाले ने दरवाज़ा खोला।
BMW वाला अपनी कार के पास रुक गया।
दोनों में से कोई संतुष्ट नहीं दिख रहा था।
कोई विजेता नहीं लग रहा था।
वे बस अपनी-अपनी गाड़ियों में बैठे और चले गए।
एक सड़क से।
फिर दूसरी सड़क से।
लड़का वहीं बैठा रहा।
साहिल ने अपनी सिगरेट खत्म की।
लड़के ने उसकी ओर देखा।
“मुझे क्या करना चाहिए?”
साहिल ने उसकी ओर देखा।
“तुम क्या करना चाहते हो?”
“मुझे नहीं पता।”
“तो इसका जवाब कोई और तुम्हें नहीं दे सकता।”
लड़के ने नीचे देखा।
साहिल खड़ा हुआ।
उसने शरीर को थोड़ा सीधा किया।
“घर जाओ। सोओ। अपने माता-पिता से बात करो। सोचो कि तुम क्या चुन रहे हो—और क्या छोड़ रहे हो।”
लड़के ने सिर हिलाया।
साहिल अपनी कार की ओर चल पड़ा।
तभी लड़के ने पीछे से पुकारा।
“अंकल।”
साहिल मुड़ा।
लड़का कुछ जाना-पहचाना-सा लग रहा था।
“आप क्यों रुके थे?”
साहिल ठिठक गया।
उसकी स्मृति में कुछ हिल गया।
चौराहा।
बंद पड़ा ढाबा।
वही बेंच।
चार रास्ते।
अचानक दुनिया जैसे एक पल के लिए घूम गई।
वह इस जगह को पहले देख चुका था।
कल नहीं।
पिछले साल नहीं।
सत्रह साल पहले।
वह इक्कीस साल का था।
मुंबई की नौकरी का ऑफर मिलने के बाद वह यहाँ आया था।
वह गुस्से और उलझन में बिना किसी दिशा के गाड़ी चलाता हुआ यहाँ पहुँचा था।
और यहाँ तीन आदमी थे।
एक युवा आदमी।
एक साधारण आदमी।
एक सफल आदमी।
वह इसी बेंच पर बैठा था।
उन्होंने उसे अपनी-अपनी कहानियाँ सुनाई थीं।
और फिर उस युवा आदमी ने उससे वही सवाल पूछा था।
तुम क्यों रुके?
साहिल लड़के को देखता रहा।
उसे पता था कि अब आगे क्या होगा।
लड़के ने पूछा,
“आपने रुकने का फैसला क्यों किया था?”
साहिल मुस्कुराया।
उस शाम पहली बार उसके चेहरे पर सचमुच की मुस्कान आई।
“क्योंकि मैं उनमें से कोई भी नहीं बनना चाहता था।”
लड़के ने भौंहें सिकोड़ लीं।
साहिल ने आगे कहा,
“मेरी ज़िंदगी परिपूर्ण नहीं है। शायद कभी होगी भी नहीं।”
उसने चारों रास्तों की ओर देखा।
“लेकिन हर किसी को सब कुछ नहीं मिलता।”
लड़का चुप रहा।
साहिल ने कहा,
“कभी-कभी ज़िंदगी इस बारे में नहीं होती कि तुम्हें क्या हासिल करना है।”
वह रुका।
“बल्कि इस बारे में होती है कि तुम क्या खोना नहीं चाहते।”
लड़का कुछ देर सोचता रहा।
फिर उसने सिर हिलाया।
उसने हेलमेट पहना।
“धन्यवाद।”
उसकी मोटरसाइकिल चार रास्तों में से एक पर आगे बढ़ती हुई अँधेरे में गायब हो गई।
साहिल अकेला खड़ा रह गया।
वह सोचने लगा कि लड़का बेंगलुरु की नौकरी लेगा या नहीं।
शायद लेगा।
शायद नहीं लेगा।
शायद वह चला जाएगा और दस साल बाद लौटेगा।
शायद वह रुक जाएगा और उस रास्ते के बारे में सोचता रहेगा, जिसे उसने नहीं चुना।
कोई परिपूर्ण उत्तर नहीं था।
सिर्फ परिणाम थे।
साहिल अपनी कार में बैठने ही वाला था कि उसकी नज़र किसी चीज़ पर पड़ी।
एक साइकिल।
एक युवा लड़की चौराहे पर पहुँची थी।
वह रुकी।
उसने चारों रास्तों की ओर देखा।
बाईं ओर देखा।
फिर दाईं ओर।
फिर पीछे।
वह पूरी तरह उलझी हुई लग रही थी।
साहिल दूर से उसे देखता रहा।
वह उसे नहीं जानता था।
लेकिन उस चेहरे के भाव को वह जानता था।
उसने वही भाव वर्षों पहले अपनी छोटी बहन के चेहरे पर देखा था, जब उसकी शादी तय की जा रही थी।
उसने अपनी पत्नी के चेहरे पर भी देखा था, जब उसे पता चला था कि वह गर्भवती है।
उसने अपने माता-पिता के चेहरे पर भी देखा था, जब दादा की मृत्यु के बाद उन्हें तय करना पड़ा था कि कारोबार का क्या किया जाए।
शायद यह जगह सिर्फ उसकी नहीं थी।
शायद लोग यहाँ तब आते थे, जब ज़िंदगी उनके सामने दो रास्ते रख देती थी और दोनों में से कोई भी पूरी तरह सही नहीं लगता था।
शायद उसकी बहन भी कभी यहाँ आई थी।
शायद उसकी पत्नी भी।
शायद हज़ारों लोग इस भूले हुए चौराहे पर खड़े हो चुके थे, बिना यह जाने कि उनसे पहले भी दूसरे लोग यहाँ खड़े हो चुके हैं।
आखिरकार उस लड़की ने एक रास्ता चुन लिया।
उसने साइकिल चलानी शुरू की।
साहिल उसे तब तक देखता रहा, जब तक वह दिखाई देना बंद नहीं हो गई।
फिर वह अपनी कार में बैठ गया।
इंजन शुरू किया।
एक पल के लिए उसने बनारस से दूर जाने वाली सड़क की ओर देखा।
वह सड़क उस हर चीज़ का प्रतीक थी, जो वह नहीं बन पाया।
मुंबई।
विदेश।
कॉर्पोरेट ऑफिस।
एक अलग पत्नी।
बच्चे नहीं।
पैसा।
आज़ादी।
साहिल का एक अलग रूप।
वह कभी-कभी उस आदमी के बारे में सोचता था।
लेकिन आज उसे उस आदमी से कोई नाराज़गी महसूस नहीं हुई।
क्योंकि शायद उस आदमी को भी अपने फैसलों का पछतावा होता।
साहिल ने स्टीयरिंग घुमाया।
वह घर की ओर चल पड़ा।
अपने माता-पिता की ओर।
अपनी पत्नी की ओर।
अपने बच्चों की ओर।
साड़ी की दुकान की ओर।
बहसों की ओर।
हँसी की ओर।
अव्यवस्था की ओर।
उस अपूर्ण जीवन की ओर, जिसे उसने चुना था।
वह जानता था कि शायद वह किसी दिन फिर इस चौराहे पर आएगा।
शायद तब, जब कोई और पारिवारिक झगड़ा असहनीय हो जाएगा।
शायद तब, जब कारोबार डूब जाएगा।
शायद तब, जब उसके बच्चे घर छोड़ देंगे।
शायद तब, जब वह साठ साल का होगा और सोचेगा कि उसने अपनी ज़िंदगी के साथ आखिर किया क्या।
हो सकता है तब भी वे चारों सड़कें उसका इंतज़ार कर रही हों।
और शायद उस पुरानी बेंच पर कोई और उलझा हुआ व्यक्ति बैठा हो।
लेकिन अब साहिल एक बात समझ चुका था।
ज़िंदगी इसलिए सार्थक नहीं होती कि हमारा हर फैसला बिल्कुल सही साबित हो।
ज़िंदगी इस बात से बनती है कि हम स्वीकार करें—हर चुनाव कुछ दरवाज़े बंद कर देता है।
और कभी-कभी, जब हम कोई एक रास्ता चुनते हैं, तो हम सिर्फ उस रास्ते से मिलने वाली चीज़ों को नहीं चुन रहे होते।
हम उन चीज़ों को भी छोड़ने का चुनाव कर रहे होते हैं, जिन्हें पीछे छोड़ने के लिए हम तैयार हैं।
दूर बनारस की रोशनियाँ दिखाई देने लगीं।
साहिल उनकी ओर बढ़ता रहा।
घर उसका इंतज़ार कर रहा था।
और इस बार उसने यह सोचने की कोशिश नहीं की कि उसने सही चुनाव किया था या नहीं।
वह बस आगे बढ़ता रहा।
चौराहा

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